अमीर ख़ुसरो: भारत के महान राष्ट्रवादी फ़ारसी कवि

Word For Peace

(Translated from English by Pooja Kumari) 

अमीर खुसरो भारत के महान कवि थे, जो अपने राष्ट्रवादी और उदार विचारों के लिए जाने जाते हैं। वह पारम्परिक फारसी और लोक कविता दोनों में पारंपरिक साहित्यिक कविता लिखने में माहिर थे| जो खड़ी बोलि, ब्रज भाषा, अवधी और अन्य क्षेत्रीय बोलियों का मिश्रण था। एक ओर उन्होंने पारंपरिक फ़ारसी ग़ज़लों की रचना की जिसमें प्रेम और रहस्यमय विचारों को प्रस्तुत किया | दूसरी ओर उन्होंने (हिंदवी) या प्रारंभिक अवस्था में उर्दू में लोक कविता (पहेली, कह मुखरनी, ढकोसला, दोहा आदि की रचना की)|  उन्होंने राजाओं,भारत की संस्कृति, धर्म और कला पर मसनवी (लंबी कविताएँ) भी लिखीं । फ़ारसी ग़ज़ल और मसनवी ने उन्हें उस समय के साहित्यिक क्षेत्र का गौरव प्रदान किया था, जिन लोक कविताओ को  उन्होंने स्थानीय भाषा में लिखी थी और उन्हें आम जनता के बीच लोकप्रिय बनाया था।

उनके स्वभाव और काव्यात्मक शैली को समझने के लिए हमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी परवरिश को देखना चाहिए। उनका जन्म 1258 में आगरा के पास उत्तर प्रदेश के जिला पटियाली में मोमिन अबाद में हुआ था। उनके पिता सैफुद्दीन महमूद एक तुर्की  थे और चंगेज़ खान के आक्रमण के समय तुर्किस्तान से आए थे। वह हजारा जनजाति से थे। वह भारत में बस गए। उनकी मां दौलत नाज एक राजनयिक (राजाओं की सलाहकार) इमदुल मुल्क की बेटी थीं। इसलिए अमीर खुसरू को तुर्की और भारतीय संस्कृति दोनों विरासत में मिलीं। लेकिन बाद के वर्षों में, उन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए एक गहरा प्रेम विकसित किया। उन्होंने भारतीयों को नीची जाति की नजर से नहीं देखा और न ही अपने तुर्की मूल का घमंड कभी किया। अपनी मसनवी में, उन्होंने भारत की भूमि और उसके वनस्पतियों,जीवों की सुंदरता, भारतीयों, इसकी नदियों, पहाड़ों, जानवरों, फलों इसके शहरों और कस्बों के रीति-रिवाजों तथा अनुष्ठानों का जश्न मनाया है।

वह भारत के अपने प्रेम को इतनी इतनी गहराई से व्यक्त करते है कि वह एक राष्ट्रवादी कवि के रूप में उभरते  है। यह आश्चर्यजनक लग सकता है क्योंकि उन्होंने 13 वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद के विचार को उजागर और प्रचारित किया जब राष्ट्रवाद या राष्ट्र-राज्य का विचार एक राजनीतिक सिद्धांत के रूप में, विकसित नहीं हुआ था न ही भारत एक राष्ट्र-राज्य के रूप में एकजुट नहीं हुआ था। उस अवधि के दौरान भारत में मुस्लिम शासकों का शासन था और इसीलिए उनकी धर्मनिरपेक्षता या राष्ट्रवाद उनकी राजनीतिक या सामाजिक मजबूरी नहीं थी। उन्होंने भारत को इतने उच्च सम्मान में रखा कि अपने मसनवी में वह भारत की तुलना मुसलमानों के दो सबसे प्रतिष्ठित स्थानों, मक्का और मदीना से करते हैं।

अपने मसनवी क़िरानुस सा ‘अदीन में उन्होनें दिल्ली के  स्थानों, स्मारकों और यहाँ के लोगों की प्रशंसा की हैं:

इसके लोग फरिशतें हैं

वे स्वर्ग के लोगों की तरह जिंदादिल और अच्छे स्वभाव वाले हैं

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