आत्मघाती हमला सभी परिस्थितियों में हराम है: कुरआन और हदीस की रौशनी में

गुलाम गौस सिद्दीकी देहलवी

किया आतंकवादी कार्यों को अंजाम देने के लिए आत्मघाती बम विस्फोट का उपयोग इस्लामी शरीअत में वैध है या अवैध? यह स्पष्ट हो गया है कि आइएस का तथा-कथित ‘जिहाद’ फसाद है जिहाद नहीं, लेकिन क्या इस्लामी शरीअत ने जिहाद के दौरान आत्मघाती हमले को वैध करार दिया है, जैसा कि कुछ वहाबी विचारधारा के लोग कुछ स्थितियों में इसके औचित्य का दावा करते हैं? आत्मघाती हमले के विचारों को बढ़ावा देने वालों के बारे में इस्लाम का क्या हुक्म है? आत्मघाती हमला आतंकवादियों का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन गया है। 28 जून 2016 को आतंकवादियों ने इस्तांबुल के अतातुर्क हवाई अड्डे पर तीन आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया जिसमें लगभग पैंतालीस से अधिक लोग अकारण मारे गए। इराक की धरती में यूं तो हर दिन आत्मघाती हमले हो रहे हैं, यह एक ऐसा देश बन चूका है जहां मुसलमानों पर आईएस द्वारा होने वाले उत्पीड़न की ओर लोगों, मीडिया और खासकर पश्चिमी देशों के लोगों का ध्यान बहुत कम ही जाता है, यहां तक ​​कि इस साल दुनिया के सबसे भयानक आत्मघाती हमला, 3 जुलाई को इराक में हुआ जिसमें लगभग 215 से अधिक इराकी मुसलमान और शहरी हत्या किए गए, फिर भी जनता और मीडिया मूकदर्शक बने रहे। क्या इस्लाम ने इन हमलों को किसी विशेष स्थिति में जायज़ करार दिया है जैसा कि आईएस के वहाबियों और रहनुमाओं ने इस तरह का झूठा दावा कई बार किया है? आत्मघाती हमले को अंजाम देने वाले स्वर्ग में जाएंगे या नरक में?

इससे पहले कि हम कुरआन और हदीस में जवाब खोजें, हमें इस विषय के महत्व का एहसास जरूर होना चाहिए क्योंकि आत्मघाती हमला आईएस के आतंकवादियों और चरमपंथियों का सबसे मजबूत हथियार है जिसका उपयोग वे उन तमाम मुसलमानों और गैर मुस्लिमों की हत्या करने के लिए कर रहे हैं जो उनके वहाबी विचारधारा से सहमत नहीं। मौजूदा 2016 के जून के महीने में पांच हजार से अधिक इराकी नागरिक और सुरक्षा बल के सदस्य आईएस द्वारा किए गए आत्मघाती हमले में बेरहमी से क़त्ल किए गए। इराकी नागरिकों को लक्ष्य बनाने वाला आतम्घाती हमला इतना रिवाज पा चूका है कि लोग इराक में हिंसा और बेगुनाहों की हत्या की घटनाओं के सामने मृत हृदय और संवेदनहीन हो चुके हैं। न तो किसी पश्चिमी अखबार के पन्नों पर पीड़ितों का रिकॉर्ड और उन की जीवन की कहानी है और न ही इन हमलों के बारे में कोई हैश टैग।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल बगदाद और इराक के अन्य शहरों में आईएस द्वारा होने वाले आत्मघाती बम धमाकों और हमलों में से कुछ निम्नलिखित हैं:

3 जुलाई 2016: बगदाद आत्मघाती बम हमले में लगभग 215 लोगों की हत्या की गई और अन्य 200 से अधिक लोग घायल किए गए। यह इराक की धरती पर होने वाले घातक हमलों में से एक था।

9 जून 2016: बगदाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में होने वाले दो आत्मघाती हमलों में कम से कम 30 लोग मारे गए। इन हमलों की जिम्मेदारी आईएस ने ली।

17 मई 2016: बगदाद में आईएस द्वारा किए गए चार बम धमाकों में 69 लोगों की जान गई।

11 मई 2016: बगदाद में हुए कार बम में 93 लोग मारे गए।

1 मई 2016: इराक के समावह के दक्षिणी शहर में किए गए आत्मघाती हमले ने लगभग 33 लोगों की जान ली।

26 मार्च 2016: आत्मघाती हमले ने अलेक्जेंड्रिया के केंद्रीय शहर में होने वाले फुटबॉल मैच को निशाना बनाया जिसमें 32 लोग मारे गए।

6 मार्च 2016: हिला के केंद्रीय शहर के पास चौकी पर ईंधन टैंकर को विस्फोट से नष्ट किया गया, जिसमें 47 लोग मारे गए।

28 फरवरी 2016: दो आत्मघाती बम हमलों ने सदरनगर के एक बाजार निशाना बनाया जिसमें 70 लोग मारे गए।

आत्मघाती हमला इस्लाम में बिल्कुल हराम है

इस्लाम ने कभी भी और किसी भी कारण से आत्मघाती हमलों का औचित्य नहीं दिया, न तो किसी युद्ध और न तो किसी जिहाद के दौरान, बल्कि इस्लाम ने मुसलमानों को हमेशा इस कार्रवाई से रोका है। इसके बावजूद आईएस इस कार्य का अंधाधुंध तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं। आईएस वहाबी अपने संस्थापकों के विचारों के दर्पण युद्ध रणनीति के रूप में जमानत के उपयोग का औचित्य साबित कर रहे हैं, लेकिन इस्लाम के अध्ययन से यह बात बिलकुल ही स्पष्ट है कि इस्लाम ने आत्महत्या और आत्मघाती हमले को बिल्कुल हराम क़रार दिया है। आत्मघाती हमलावरों को यह बात मालुम होनी चाहिए की वे अल्लाह के आदेशों और प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आदेश की खुली अवज्ञा कर रहे हैं। कुरआन और हदीस की रोशनी में हमें यह बात मालूम है कि आत्मघाती हमलावर हमेशा नरक में रहेंगे।

आत्मघाती हमला हराम है: कुरान की रौशनी में

आतम्घाती हमला चाहे खुद की जान लेने के लिए हो या दुसरे लोगों की जान मारने के लिए हो, हर हाल में कुरआन करीम ने सख्ती से इसे मना [हराम] किया है

अल्लाह तआला का फरमान है:

“खुद को हलाकत में मत डालो।” (4:29)

अल्लाह तआला का यह आदेश मोमिनों के लिए है। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि आज्ञाकारी मोमिन ही इस आदेश पर अमल करेंगे। केवल नाफरमान लोग ही खुद को हलाकत में डालेंगे। इस आयत में आत्मघाती हमलों के निषेध आमतौर पर है। किसी विशेष कारण की परवाह किए बिना आत्मघाती हमले की अनुमति न तो व्यक्तिगत स्तर पर है और न ही सार्वजनिक रूप से है।

इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी रहमतुल्लाह अलैहि इस आयत (4:29) की व्याख्या में लिखते हैं:

“इस आयत” खुद को हलाकत में मत डालो” से यह साबित होता है कि ज़ुलमन खुद को हलाक करना या किसी और को हलाक करना अवैध है (इमाम राज़ी, तफसीरे कबीर, 57:10)

आत्मघाती हमले को आयत 4:29 में हराम करार दिया गया है। और उसकी अगली आयत (4:30) में अल्लाह तआला ने आत्मघाती हमलावरों को सजा का प्रावधान संकलित किया है।

अल्लाह तआला का फरमान है:

“और जो व्यक्ति यह (नाफरमानियाँ) सरकशी और अत्याचार करेगा तो जल्द ही हम उस को इस आग में प्रवेश करेंगे और यह अल्लाह पर आसान है”। (4:30)

इस्लामी फ़ुक़्हा के बीच इस बात पर आम तौर पर मुत्तफ़िक़ हैं कि जब अल्लाह पाक आमतौर पर कोई कानून बनाता  है तो सबूत के अभाव में सीमा निशचित करना सही नहीं है। इसी वजह से आतंकवादी संगठनों के लिए तथाकथित ‘जिहाद’ के नाम पर आत्मघाती हमलों का औचित्य साबित करना अवैध है और अचूक रूप में शरीयत इस्लामिया का उल्लंघन है।

यह ध्यान देने योग्य है कि आतंकवादी संगठनों के तथाकथित ‘जिहाद’ मुसलमानों और गैर मुसलिमों सहित निर्दोष नागरिकों की हत्या से चिह्नित है। आतंकवादी संगठनों को यह मालूम होना चाहिए कि युद्ध के मामले में इस्लामी जिहाद की अनुमति केवल उत्पीड़न के उन्मूलन और मुसलमानों के जान-माल की रक्षा में ही था। यह केवल राज्य स्तर पर रक्षा के लिए ही वैश्विक है। इसलिए , आतंकवादी संगठनों को अपने विचारों में सुधार करना चाहिए कि आक्रामक हमलों के लिए कभी भी आत्मघाती हमलों का औचित्य नहीं पेश किया जा सकता है। और दूसरी बात यह है कि अल्लाह ने आमतौर पर आत्मघाती हमलों के निषेध भेजा है। आत्मघाती हमलावरों का ठिकाना नरक है। इसलिए आतंकवादी संगठनों और उनके युवा जिनका नकारात्मक ज़ेहन बनाया गया है को जान लेना चाहिए की वे किसी भी विशिष्ट कारण से आताम्घाती हमले को जायज़ साबित नहीं कर सकते।

एक दूसरी आयत में अल्लाह का फरमान है:

“और अपने हाथों हत्या में न पड़ो और अच्छा व्यवहार व अहसान करो, अल्लाह तआला दया करने वालों को दोस्त रखता है” (2: 195)

इस्लामी फ़ुक़्हा और उलेमा इस बात पर सहमत हैं कि इस आयत (2: 195) का उतरना अल्लाह की राह में खर्च करने के संबंध में हुवा है। हालांकि, उन्होंने इस आयत को किसी भी तरह से खुद को मारने या आत्मघाती हमलों के लिए प्रतिबद्ध करनें को हराम क़रार देने के लिए एक सबूत के रूप में भी दोहराया है। उन्होंने अपने इस निर्णय का आधार इस आयत में वर्णित शब्द (तहलुकह) को बनाया है। इसके अलावा वह आत्मघाती हमलों के निषेध के लिए 4:29 और 4:30 जैसी दूसरी आयतों और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कई हदीसों का भी हवाला देते हैं।

इमाम बगवी ने आयत 4:30 की व्याख्या आयत 2: 195 का हवाला देते हुए किय है। वह लिखते हैं: “उल्लेख मिलता है कि उसने उस मुसलमन कि तरफ़ इशारा किया है जो खुद को हलाक करते है “। (तफसीर बगवी अल मारूफ बा मआलिमुतन्ज़ील: 1: 418)

हाफिज़ इबने हजर असकलानी रहमतुल्लाह अलैहि ने कहा:

“जहां तक ​​इस आयत (2: 195) को अल्लाह के रास्ते में खर्च नहीं करने के संदर्भ में सीमित रखने की बात है तो इसके लिए अधिक बातचीत की आवश्यकता है इसलिए के यह आदेश सामान्य अर्थ  पर आधारित है।” (फतहुल बारी: 8/115)

इमाम शौकानी रहमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया:

इबने जाबिर तबरी का मानना ​​है कि “आयत (2: 195) के संबंध में पिछले विद्वानों के कई राय और विचार है। लेकिन तथ्य यह है कि इस शब्द में महत्व इसके सामान्य अर्थ को प्राप्त है किसी विशेष कारण को नहीं । दीनी और दुनियावी आधार पर हर वह चीज इस शब्द (तह्लुकह) विनाश में शामिल है जिसका उल्लेख आयत 2: 195 में है। “(फतहुल क़दीर: 1/193)

फिक़्हे इस्लामी के इस प्रसिद्ध सिद्धांत के आधार पर कि “आदेश आम अर्थ पर आधारित होता है विशेष अर्थ पर नहीं” इस्लामी फ़ुक़्हा और विद्वानों के नक्शेकदम पर चलते हुए मेरा भी यही मानना ​​है कि आयत 2: 195 व्यक्तिगत या सार्वजनिक रूप से आत्महत्या हमलों सहित सभी प्रकार की तबाहियों पर रोक लगाती है।

चूंकि कुरआन को समझने का सबसे अच्छा तरीका “तफ्सीरुलकुरान बिलकुरान” है इसलिए मेरा भी यही मानना ​​है कि आयत 2: 195 की बेहतर तफसीर तहलुकह के सामान्य अर्थ के साथ आयत 4:29 की रोशनी में की जा सकती है जिससे यह साबित होता है कि आत्मघाती हमला हराम हैं और अल्लाह तआला ने आत्मघाती हमलावरों के लिए नरक में स्थायी अजाब का हुक्म सुना चूका है।

शब्द (तहलुकह) के सामान्य अर्थ को समझ लेने और आयत 2: 195 की व्याख्या आयत 4:29 की रोशनी में देख लेने के बाद अब मोमिनो पर यह बात दिन की रोशनी की तरह स्पष्ट है कि इस्लाम में आत्मघाती हमला सख्त मना है । और अगर किसी व्यक्ति की कट्टरपंथी विचारधारा के विचारकों ने इतना नकारात्मक मन बना दिया हो कि वह इन दोनों कुरानी आयतों की वास्तविक व्याख्या तक पहुँचने में असफल रहा हो या किसी भी संदेह या भ्रम का शिकार हो गया हो तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अनगिनत सुंदर हदीसों की मदद से भी उनके मन और मस्तिष्क को पारदर्शी करना चाहूंगा जिनमें कड़ाई क़े साथ व्यक्तिगत या सार्वजनिक रूप से आत्मघाती हमलों के खिलाफ निषेध वारिद हुई है।

आत्मघाती हम्ला हराम है: अहादीस की रौशनी में

हुज़ूर सरवरे कायनात मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

“आत्महत्या करने वाला नरक में जाएगा तथा नरक में उसका सदा वास होगा (सही बुखारी, किताब अल दियत, “अध्याय: जहर लेना और चिकित्सा उपचार के लिए जहर या उन चीजों का उपयोग करना जिनके खतरनाक या अशुद्ध होने का गुमान हो” )

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

“जो व्यक्ति आत्महत्या के लिए खुद को घायल करता है वह नरक में भी खुद को ज़खमी करता रहेगा। और जो व्यक्ति पहाड़ से कूद कर आत्महत्या करेगा उसे नरक में भी पहाड़ों से गिराया जाएगा। और जो फांसी लगाकर आत्महत्या करेगा उसे नरक में भी फांसी दी जाती रहेगी। (सही बुखारी, किताब: हुकुके तदफीन, अध्याय: आत्महत्या करने वालों का बयान)

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

जो व्यक्ति जिस चीज़ से आत्महत्या करता है उसे नरक में इसी बात से दंडित किया जाएगा, और किसी मोमिन पर लानत भेजना उसे मारने के समान है, और जो कोई किसी मोमिन पर कुफ्र का आरोप लगाता है तो यह ऐसा है मानो कि उसे मार दिया हो। “(बुखारी, किताब: अखलाक़ हसना, अध्याय: अगर किसी ने किसी उचित आधार के बिना अपने मुस्लिम भाइयों को काफ़िर कहा तो वह खुद काफिर है, सही मुस्लिम)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

“जो व्यक्ति जानबूझकर किसी पहाड़ से कूद कर आत्महत्या करता है वह नरक में जाएगा और हमेशा वहीं रहेगा। और जो जहर पीकर आत्महत्या करता है वह नरक के अंदर अपने हाथ में अपने जहर को लेकर चले और उसे पिएगा और हमेशा नरक में ही रहेगा और जो व्यक्ति किसी लोहे के हथियार की मदद से आत्महत्या करता है वह नरक के अंदर अपने हाथ से इस हथियार अपने पेट पर मारेगा और हमेशा नरक में ही रहेगा। “(सही बुखारी, किताब अल दियत, “अध्याय: जहर लेना और चिकित्सा उपचार के लिए जहर या उन चीजों का उपयोग करना जिनके खतरनाक या अशुद्ध होने का गुमान हो”)

आत्मघाती हमले की दावत देने वाले लीडरों का पालन करना नाजायज़ व हराम है

हज़रत अली रहमतुल्लाह अलैहि बयान करते हैं:

“नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक सेना को भेजा और एक व्यक्ति को उसका कमांडर नियुक्त किया। इसके बाद इस व्यक्ति ने आग भड़काई और सैनिकों को इसमें प्रवेश के लिए कहा कुछ लोगों ने इसमें प्रवेश का इरादा किया तभी कुछ लोगों ने कहा कि हम इससे दूर भाग गए (यानी हम खुद को आग से बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार किया है)। उन्होंने यह सारा माजरा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में वर्णित किया इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन लोगों के बारे में जिनका आग में प्रवेश करने का इरादा था, कहा कि ” अगर वे इसमें प्रवेश कर जाते तो वह क़यामत तक इसी में रहते। ” फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दूसरों से कहा कि “बुरे कामों में किसी भी पालन जरूरी नहीं है आज्ञाकारिता केवल नेक कार्यों में आवश्यक है। “(सही बुखारी, [पुस्तक: एक सच्चे आदमी की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी को स्वीकार करना, अध्याय: सभी मामलों में एक सच्चे मनुष्य की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी को स्वीकार करना और सही मुस्लिम किताबुल कयादह )

इससे मिलती जुलती शब्दों का ज़िक्र दूसरी मुख्तलिफ अहादीस में मामूली बदलाव के साथ मिलता है, मुस्लिम [किताब: क़यादत, अध्याय: इन मामलों में लीडरों की आज्ञाकारिता की अनिवार्यता जिनमें पापों का दखल न हो, लेकिन पाप के मामलों में उनके आज्ञा का पालन करना हराम है], सुन्न निसाई [किताब अल बैअह, अध्याय: पाप का आदेश देने और उसकी आज्ञा का पालन करने वालों को सजा बयान] और सुनन अबी दाऊद [किताब अल जिहाद, अध्याय: आज्ञाकारिता का बयान]।

इस हदीस के अनुसार, लीडरो का पालन करना केवल अच्छे मामलों में ही आवश्यक है, बुरे मामलों में नहीं, जैसे: व्यक्तिगत या सार्वजनिक रूप से आत्मघाती हमले के मामले में लीडर की पालन करना जायज़ नहीं है।

आत्मघाती हमलावरों के लिए जन्नत हराम

जुनदुब बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपनी मुसनद में लिखा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि:

“तुम से पहले के लोगों में एक व्यक्ति को घाव हो गया था। उसका घाव इतना यातनादायक था कि उसने एक चाकू लिया और अपने घाव को काट लिया इससे उसका खून निकलता रहा जब तक वह मर ना गया। अल्लाह तआला ने फरमाया: मेरे बंदे ने खुद मेरी पेशबंदी की, इसलिए मैं इस पर स्वर्ग मना कर दिया है। यह हदीस सही बुखारी में वर्णित है [किताबुल अम्बिया: इस्राएल के बच्चों के ज़िक्र का बयान] सही मुस्लिम [ किताबुल ईमान, बाब ‘आत्महत्या का गंभीर निषेध और यदि कोई जिस चीज़ की मदद से आत्महत्या करता है उसे नरक में इसी चीज़ से सताया जाएगा] और सही इब्ने हिब्बान ने भी उसे रिवायत किया है।

जिहाद के दौरान आत्मघाती हमलावरों के लिए स्वर्ग हराम है

कुरान और हदीस के अनुसार आत्मघाती हमला आमतौर पर हराम है। हालांकि, आतंकवादी संगठन तथाकथित ‘जिहाद’ और ‘शहादत’ के आधार पर किसी भी तरह का औचित्य साबित कर युवा लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अल्लाह की क़सम वह निम्नलिखित हदीस को विकृत कर रहे हैं और इसे नजरअंदाज कर रहे हैं जो असली जिहाद (यानी रक्षात्मक जिहाद) के दौरान भी आत्महत्या को हराम क़रार दिया है, स्वयंभू ‘जिहाद’ की तो बात ही छोड़ दें।

सहल से मरवी है:

अपने एक गज़वह के दौरान, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो इस्लामी सिपाहियों को मुशरिकीन के साथ लड़ता हुआ देखा और फिर उनमें से प्रत्येक अपने सैन्य शिविर में वापस चले गए। मुसलमानों ( के सेना) के बीच एक ऐसा व्यक्ति भी था जो सेना से दूर जाकर प्रत्येक काफिर का पीछा कर रहा था और उस पर तलवार से हमला कर रहा था। लोगों ने कहा कि “ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! इतने संतोषजनक ढंग से कोई नहीं लड़ रहा है (यानी, यह बहुत बहादुर मुसलमान है)।” इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: “यदि यह व्यक्ति नारकी है तो आप में से कौन जन्नती है?” फिर उनमें से एक व्यक्ति ने कहा कि “मैं उसकी पैरवी करूंगा और उसके तेज और धीमी गतिशीलता में उसके साथ रहूंगा।” इसी बीच वह बहादुर व्यक्ति घायल हो गया और अचानक मौत की कामना करने लगा, और उसने तलवार के हैंडल कों जमीन पर रखा और उसकी नोक को अपने सीने में उतार करके उसने आत्महत्या कर ली। उसकी शव को देखने वाला एक व्यक्ति नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास वापस आया और कहा: “मैं गवाही देता हूँ कि तुम अल्लाह के दूत हो”। इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “यह क्या है?” तो उस व्यक्ति ने पूरा माजरा वर्णन किया। यह सुनने के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि हो सकता है कि किसी का कर्म लोगों को स्वर्ग की प्रक्रिया लगे लेकिन वास्तव में वह नरक की प्रक्रिया है और बहुत से लोग ऐसे हैं कि जिसका काम लोगों को नरक की प्रक्रिया लग सकता है लेकिन दरअसल वह जन्नती होते हैं। “(सही बुखारी [किताबुल मगाज़ी बाब: गज़वह खैबर],सही मुस्लिम [किताबुल अक़ाएद» बाब: आत्महत्या के खिलाफ सख्त मनाही का विवरण, जो व्यक्ति जिस से आत्महत्या करता है उसे नरक में इसी से दंडित किया जाएगा)

आत्मघाती हमलावरों के जनाज़े कि नमाज़ पढ़ना भी वर्जित है

एक रिवायत के अनुसार, हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के जनाज़े की नामज़ नहीं अदा किया।

जाबिर बिन समुरा से मरवी है:

पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने एक ऐसे व्यक्ति के अंतिम संस्कार लाया गया जिसने एक चौड़े नोक वाले तीर से आत्महत्या कर ली थी, लेकिन आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जनाज़े की नमाज़ अदा नहीं की- (मुस्लिम [किताबुल जनाईज़ , बाब : आत्महत्या करने वालों के जनाज़े की नमाज़ छोड़ना)

कुरआनी आयतों और अहादीस का अध्ययन करने के बाद एक सही मुसलमान जिसे कुरआन के बारे में कोई संदेह नहीं है और जो हदीस की हुज्जियत पर विश्वास रखता है वह कभी भी आत्मघाती हमलों का औचित्य नहीं रख सकता। वह कभी भी आईएस द्वारा किए गए आत्मघाती हमलों का औचित्य किसी भी मामले में पेश नहीं कर सकता। एक मुसलमान जिसे अल्लाह और उसके प्यारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्यार की मिठास नसीब हुई हो वह हमेशा आत्मघाती हमले को अवैध व हराम ही समझेगा। एक सही मुसलमान खुद को विस्फोट से उड़ा कर अपने जीवन को नष्ट नहीं कर सकता। वह आत्मघाती हमलों के लिए किसी दूसरे मुसलमान को नहीं उभारा सकता। अगर कोई यह हराम कार्य करता है तो वह नरक में सजा का हकदार होगा और हर उस रास्ते से भटक जाएगा जो अल्लाह और उसके प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के करीब का कारण है।

इसलिए, मेरे प्रिय और इस्लामी भाइयों और बहनों कृपया किसी भी आत्मघाती हमलों की दावत देने वाले आतंकवादी विचारधारा निर्माताओं का शिकार न बनें। सीरिया, इराक, पाकिस्तान, नाइजीरिया और लीबिया आदि में होने वाले तथाकथित ‘जिहाद’ की तो बात ही छोड़ दिजिये आत्मघाती हमले वास्तविक जिहाद के दौरान भी सख्त मना है। अल्लाह ने आप सभी मानव जाति को अपनी इबादत व बंदगी के लिए बनाया गया है। “मैंने सभी जिन्नातों और इंसानों को इसलिए बनाया कि वह केवल मेरी पूजा करें (51:56)”। कुरआन या हदीस में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि अल्लाह ने आपको आत्मघाती हमलों के लिए प्रतिबद्ध करने के लिए बनाया है। अल्लाह की मंशा यह है कि आप सभी आत्मघाती हमलों सहित सभी हराम कामों से खुद को बचाएं और अपने दिल को अल्लाह और उसके प्यारे पैगम्बर के प्रेम के प्रकाश से रोशन करें।

अल्लाह हमारे मुसलमान भाइयों को आतंकवादी विचारधारा निर्माताओं से बचाए! आमीन

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