इस्लामी शिक्षाओं में वहदतुल वजूद (अद्वैतवाद) क्या है?   

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By फ़तेहउल्लाह गुलेन (Translated from English article)

वहदतुल वजूद (जिसका शाब्दिक अर्थ है किसी जीव का एक होना या एकता) एक ऐसी शिक्षा है जिसका संबंध रहस्यवादियों एवं सूफियों के साथ जोड़कर देखा जाता है। हालांकि यह विषय इस बात की ओर इशारा करता है कि किस प्रकार एक सूफी अपने आंतरिक अनुभवों से गुजरता है, इसे एक दार्शनिक एवं सैद्धांतिक संदर्भ में भी समझने की कोशिश की गई है और उसकी कई प्रकार से व्याख्या की जाती रही है। कुछ लोगों ने तो इसे व्यावहारिक रूप से वहदत अल मौजूद से अलग नहीं माना है। (अस्तित्व का एक होना या उसकी एकता), यह एक ऐसा दर्शन है जिसे पश्चिम में मोनिज्म अर्थात अद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है।

लेकिन जो भी स्थिति रही, वहदतुल वजूद हम तक प्रयोग एवं समझ से कई अतिरेकों एवं अतिक्रमों द्वारा हम तक पहुंचा है। कुछ मामलों में तो इसको प्रयोग में लाने के लिए कोई उचित शब्द हाथ नहीं लगा, इस वजह से तो दूसरी वजह यह रही कि जिस अंदाज से इसे इस्तेमाल किया जाता रहा है उसमें कोई कमी रही और जिसे इस दुनिया के साधारण एवं गोचर यथार्थ पर लागू करके देखा। एक दूसरे मामले में दूसरी दार्शनिक मान्यताओं की तरह ही इसे समझने की कोशिश की गई खास तौर पर सर्वेश्वरवाद के साथ। यह वाक्यांश वहदतुल वजूद जिसे अगर सही प्रकार से कहा जाए तो केवल इसको अल्लाह के साथ जोड़ कर देखा जा सकता है। लेकिन उसे कई प्रकार से सोचा गया और उसकी व्याख्या की गई और जिसका नतीजा यह निकला कि कई प्रकार की अस्वस्थ अटकलों एवं विवादों ने जन्म लिया।

जो लोग वहदतुल वजूद के कायल हैं वे तीन प्रकार के तौहीद अर्थात एकात्मकता की बात करते हैं:

1. तौहीद अल आफाल (कारक की एकता या एकात्मकता): उसका अर्थ यह है कि प्रत्येक कार्य और उसका असली कारक केवल ईश्वर है। यह इस विचार से जन्म लेता है कि जो कुछ इस दुनिया में मौजूद है या होता है उसके लिए किसी और कारण की तलाश करने की जरूरत नहीं है। जो कुछ जहां भी मौजूद है वह सब अल्लाह का किया हुआ है। (चूंकि हम कस्ब के विषय से भी जूझ रहे हैं यानि किसी कार्य का करना या होना) और खल्क (किसी कार्य का पैदा किया जाना), पे बातें जिनका तअल्लुक कलाम से है (धर्मशास्त्र), भाग्य को लेकर जुड़े प्रश्नों के साथ, हम इस बहस को यहां नहीं दुहराएंगे। जो लोग तौहीद अल आफ़ाल की वकालत करते हैं वे उसके पक्ष में और तर्क के तौर पर कुरआन की निम्नलिखित आयत का हवाला देते हैं।

लेकिन अल्लाह ने पैदा किया तुम्हें भी और जो कुछ तुम करते हो उसे भी। (सफ़्फ़ात 37:96) और जो कुछ है सब अल्लाह की ओर से है……. (निसा 4:78)

2. तौहीद अल सिफात (कर्ता की एकता या एकात्मकता): इसका यह अर्थ हुआ कि इंसान जो कुछ करता है उसका असली कर्ता अल्लाह है। इस विचार के अनुसार, सारी इच्छा शक्ति, सारी शक्तियां और बल, सारे ज्ञान एवं संकाय, वे सब अल्लाह के हैं। यह एक प्रकार से उसी ईश्वर के महसूस किए जाने वाले, समझ में आने वाले भाव या कार्य हैं।

3. तौहीद अल धात (तौहीद अल वजूद भी) (जीव की एकता या एकात्मकता): इसका अर्थ यह है कि सार रूप से जो कुछ दिखाई देता है वह सब उसी एक ईश्वर का रूप है। जो कुछ भी हमारे आस-पास है और जिसके बारे में हम जानते हैं, उस ईश्वर के अलावा, वह अल्लाह ही कुछ निश्चित अवस्थाओं का प्रकटीकरण और अविर्भाव है।

इसके बारे में बहुत सारे विवाद एवं बहुत सारी बातें हैं। तौहीद की भिन्न-भिन्न शक्लों से लेकर अविर्भाव एवं प्रकटीकरण के सूक्ष्म भेदों के बीच चूंकि यहां जो सवाल पूछा गया है उसका संबंध तौहीद के तीसरे रूप से है इसलिए हम केवल तौहीद अल जात पर बात करेंगे। (मूल तत्व या जीव की एकता या एकात्मकता)।

ऐसी भिन्न व्याख्याएं एवं विचार तौहीद के बारे में इसलिए सामने आए हैं क्योंकि यह सब लोगों के अपने प्रत्यक्ष या आंतरिक अनुभव का परिणाम है। बहुत से विद्वान इस विषय को इस योग्य भी नहीं मानते कि इस पर कोई तार्किक बहस की जाए।

वास्तविक तो यह है कि जब मौजूद चीजें और घटनाएं अगर अंततः अल्लाह के साथ जोड़ कर नहीं देखी जातीं या उसके नाम के साथ जोड़ कर, तो उसे पूरी तरह व्याख्यायित कर पाना असंभव है। इस बात को सारे महत्वपूर्ण विद्वानों ने स्वीकार किया है जो गहनता और बारीकी से विचार करते हैं। जो लोग तौहीद को तार्किक दृष्टि से समझने की कोशिश करते हैं उनके जो लोग तौहीद को तार्किक दृष्टि से समझने की कोशिश करते हैं उनके और जो लोग सूफी मत के मानने वाले हैं उनके बीच इसको लेकर काफी समानता पाई जाती है। साद अल दीन तफ़ताजानी, अपनी पुस्तक शरअअल मक़ासिद (उददेश्यों की व्याख्या) में दो प्रकार के समूहों का वर्णन किया है जिनके बीच वहदतुल वजूद को लेकर बहस चलती है, जिनमें एक समूह तो ऐसा हे कि उनका संबंध सुन्नत से है यानि इस्लाम के पूर्ण रूप से मानने वाले और इस समूह के बारे में न तो काई विवाद है और न ही उसके साथ कोई ऐसी बात हैं

तफ़तजानी के अनुसार, ये दो समूह हैं सूफिया और मोतसव्विफा। पहला वजूद में बहुसंख्या की बात करता है जैसा कि मौजूद है, एक आवश्यक तत्व के रूप में। फिर भी, जब सूफी अल्लाह तक पहुंचता है, तो वह इरफान के समुद्र में अपने आप को गर्क कर देता है। उसे फना का अनुभव होता है, यानि अल्लाह को जानने या उसके रास्ते में अपने आपको खत्म कर देना यानि अपने अहं को मिटा देना और उसके गुण अल्लाह के गुण के साथ मिल जाते हैं। उसके परिणाम के तौर पर यह सूफियाना तजुर्बा यह कहने पर विवश करता है कि कोई चीज अल्लाह के अलावा अस्तित्व में नहीं होती। वह अपने सारे अविर्भाव अर्थात तजल्ली का मिखराक़ अर्थात केंद्रबिंदु समझने लगता है। इसे सूफी फना फी अल तौहीद की अवस्था कहते हैं यानि उस एक में अपने आपको मिला देना या पूर्ण रूप से घुला देना। सूफी इस मिलन को हुलूल यानि अल्लाह में समा जाना या उससे मिल जाना यानि इत्तेहाद की अवस्था कहते हैं।

कुछ सूफियों के अनुसार, तौहीद की ऐसी समझ मकाम अल जम की हालत में पहुंच जाने के कारण है यानि अल्लाह से अपने को मिला देने की अवस्था। लेकिन पहली बात इरफान की है और फिर अनुभव की बात आती है यानि मजा चखने की जिसे जौक कहा जाता है। इस हालत में, चीजों के साथ वास्तविक रूप में मौजूद होना वह सूफियों की दृष्टि मुशाहेदात से अलग माना जाएगा। यही कारण है कि असबाब यानि कारणों को मान लेना यह समझा जाएगा कि अल्लाह के साथ उसका कोई साझीदार है अर्थात शिर्क करना माना जाएगा। दूसरी ओर, बिना ऐसी चेतन अवस्था को प्राप्त किए हुए असबाब का इंकार करना और बिना उसको पूर्ण से अनुभव किए हुए, यह पाखंड होगा और केवल सैद्धांतिक दावा माना जाएगा। इसलिए जो लोग इस मिलन का इंकार करते हैं उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें इरफान प्राप्त हुआ ही नहीं और जो लोग अल्लाह और इंसान में फर्क का इंकार करते हैं जिस अवस्था से सूफी जम की हालत में गुजरते हैं वह सही मानों में अल्लाह से वास्तविक बंदगी के रहस्यों से काफी दूर की बात है। समझदार इंसान वह है जो आसानी एवं सरलता के साथ फर्क एवं जम को स्वीकार कर लेता है, अपने-अपने उचित अर्थ में।

दूसरा समूह उन लोगों का है जो पूर्ण वहदतुल वजूद के पक्षधर हैं। उनके लिए जीव एक है और जो ईश्वर से अलग नहीं है। जो कुछ दुनिया में हर ओर बिखरी चीजें दिखाई देती हैं वह सब काल्पनिक या अवास्तविक है।

जबकि वहदतुल वजूद सूफियों के लिए एक प्रभावी अवस्था अर्थात हाल के लिए एक आवश्यक चीज है या उनके सीधे अनुभव अर्थात जौक के लिए भी जरूरी है, मोतसव्विफा ऐसा मालूम होता है कि इससे एक स्थापित दृढ़ मत दर्शन के रूप में देखते हैं। मगर वास्तविकता यह है कि बहुत कम ही धर्म शास्त्रियों ने इस विचार से सहमति प्रकाट की उनमें से कुछ जलालुद्दीन दव्वानी ने सका पुरजोर बचाव किया है। लेकिन आमतौर पर अहले सुन्नत के विद्धानों का यह मानना है कि दुनिया में चीजों का अलग से एक वजूद है।

शैखुल इस्लाम एम. साबरी ने अपनी किताब मुवक्किफुल अक्ल अर्थात तर्क की अवस्था में यह संकेत करते हैं कि वजूदुल हक की परिकल्पना (एकता या यथार्थ की एकात्मकता) वहदतुल वजूद के पीछे है। लेकिन जैसा कि विद्वानों द्वारा जाना और स्वीकारा जाता है, वजूद, माहिया का एक इज़ाफ़ा है। यह इस प्रकार है कि दोनों जिसमें वजूद अर्थात आवश्यक और मुमकिन अर्थात संभावित दोनों शामिल हैं। हालांकि इमाम अल अशअरी का कुछ और विचार है। उनका कहना है कि वजूद, महिया की तरह ही है और दोनों वजूब और मुमकिन में समाया हुआ है। जबकि दार्शनिक वजूब के मामले अल अशअरी के वजूब के मामले में सहमति प्रकट करते हैं, वे मुमकिन के मामले में धर्मशास्त्रियों का पक्ष लेते हैं। चूंकि अशअरी का स्कूल और दार्शनिक यह मानते हैं कि वजूद वह अंततः ईश्वर की ओर से आया है और उसके अपने वजूद की तरफ से, इसलिए वे व्युत्पादित, संबंधित वजूद को हर जीच के साथ जोड़ कर देखते हैं और दुनिया की हर चीज को उसेी एक अल्लाह की उत्पत्ति मानते हैं।

वास्तव में, चाहे अल्लाह का वजूद या उसके गुण एक समान हों या अल्लाह के अपने वजूद से भिन्न हों उस पर काफी दिनों से बहस चलती चली आ रही है। कुछ लोग जिनमें इस्लाम के बड़े-बड़े विद्वान शामिल हैं, यह मानते हैं कि वजूदल बारी (रचयिता की एकता) वह अल्लाह के अपने वजूद जैसी ही एक चीज है। इससे नतीजा निकालते हुए यह लोग वहदतुल वजूद की शिक्षाओं को स्वीकार करते हैं और यहां तक कि भले ही वहदतुल वजूद उन्हें गलती अर्थात ज़लालत के गर्त में धकेल दे- लेकिन समय का तकाजा यह है कि हमें इस प्रकार की जिम्मेदारी लेनी की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जलालुद्दीन दव्वानी, अपनी पुस्तक रिसालाते दव्वानी में लिखते हैं कि अल हक्क अर्थात वास्तविक का वजूद समान है उस ज़ात के और उस जात अल हक्क के अलावा और कोई चीज मौजूद नहीं है। चूंकि वजूद, वजूद है, वह और कुछ नहीं हो सकता सिवाए इसके कि वह वास्तव का ही वजूद है यानि वजूदुल हक है। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि जो कुछ मौजूद है उसका वजूद वास्तविक नहीं है लेकिन वह अपने ऐतबारी अर्थात व्युत्पादित और संबंधित रूप में मौजूद हैं दव्वानी एक कदम और आगे बढ़ कर फरमाते हैं कि इसे मानना असंभव है कि उत्पत्ति जिसमें मौजूद हर चीज शामिल है वह मुस्तकिल अर्थात स्थायी तौर पर स्वतंत्र रूप से मौजूद है अपने वजूद में और अपने बाह्य रूप में: “वजूद के संबंध में, यह असंभव है कि दुनिया का स्वतंत्र वजूद स्वीकार कर लिया जाए; किसी भी चीज का अपने आप कायम रहना असंभव हैं उनके बाह्य रूप की बात जाए तो, यह असंभव है कि मुमकिनात का एक स्वतंत्र वजूद स्वीकार कर लिया जाए, क्योंकि कोई भी चीज तभी सामने आ सकती है जब उसका संबंध वास्तविक वजूद से हो और अलल हक अर्थात पूर्ण वास्तविक से है। कोई भी वास्तविक वजूद अर्थात मुस्तकिल हकीकत उसका वास्तविक वजूद नहीं है सिवाए वास्तविक वजूद के साथ संबंध को छोड़ कर, यह पूरी तरह से ईश्वर के वजूद पर निर्भर है। उसी के दम से वह कायम भी है। इसलिए हमें अस्तित्वों पर विचार नहीं करना चाहिए जो हमारे वहम अर्थात अटकलों पर आधारित हो और हमारी ओर से कल्पित किया गया हो कि वह वास्तव में मौजूद हैं।”

इब्ने अल अरबी एक कदम और आगे हैं और कहते हैं कि जो कुछ दुनिया में दिखाई देता है वह उसी ईश्वर का प्रतिबिंब और प्रकटीकरण है, यह कभी मौजूद नहीं है, न ही व्युत्पादित अर्थ में। अल्लाह निरंतर अपने को नवीनिकृत करता रहता है। एक के बाद एक नवीनिकरण की यह प्रक्रिया जारी रहती है और दुनिया लगातार मौजूद और ना मौजूद के बीच चलती रहती है इन लगातार चलने वाले प्रकटीकरण की प्रक्रिया के कारण। यह प्रक्रिया इस प्रकार चलती है कि बीच में कोई दूरी दिखाई नहीं देती।

मौलाना जलालुद्दीन रूमी उसी विचार को सामने रखते हैं, उसे और अधिक रंग-रोगन लगा कर पेश करते हैं; “ऐ आत्माओं की आत्मा! हम कौन होते हैं जो ऐसी धृष्टता कर सकें कि अपने वजूद को अपने आप पैदा हुई चीज मान लें? आपकी तुलना में, हम ऐसा दावा कैसे कर सकते हैं। हम नाचीज की एक बड़ी संख्या हैं। हमारा वजूद कुछ नहीं है। आप ही वजूदुल मुतलक हैं जो सारी फानी अर्थात खत्म होने वाली चीजों को प्रकट करता है एक ऐसे पटल पर जिसमें हर चीज को अंततः मिट जाना और खत्म हो जाना है। हम सब एक शेर की मानिंद हैं, लेकिन ऐसा शेर जो हकीकत में मौजूद नहीं है- हो सकता है कि वह शेर किसी झंडे पर उकेरा गया हो जिसे हवाएं उड़ाती फिरती हों। वह तभी झंडे के हिलने के साथ ही नजर आता है लेकिन जो हवा उसे हिलाती है वह हमें दिखाई नहीं देती। खुदा करे कि वह चीज जो हमें दिखाई देती है कभी अपने रहमो करम से हमें महरूम न करे। हमारा वजूद आप ही के दम से कायम व दायम है। आपने एक नामौजूद को वजूद का जायका नसीब किया है, अनंता में पैदा किया है और अपनी कमाल दर्जे की मुहब्बत के साथ।” ऐसे विचार जो दुनिया में हर दिखाई देने वाली चीज को अल हक के ही कारण मानते हैं वह वजूद को किसी भी चीज के साथ जोड़ कर नहीं देख सकते। रूमी जहां यह मानते हैं कि दुनिया का अपना एक वजूद हैं, जो मौजूद है, वह ऐसा केवल मजाज़ी अर्थात लाक्षणिक तौर पर है क्योंकि उसका वजूद अल हक का ही प्रकट रूप है।

फिर भी जो दुनिया हमें दिखाई देती है उसमें काफी रंगारंगी और बहुलता है। कुछ सूफी जिसका जिक्र हम ने यहां किया है, इस रंगारंगी और बहुलता को अल हक का ही प्रकट रूप मानते हैं और कहते हैं कि आईने के इस्तेअदात अर्थात उसकी सलाहियत पर निर्भर हैं उनका यह भी कहना है ऐसे विचार अल्लाह के एक होने के विचार के प्रतिकूल नहीं है।

जुनैद अल बगदादी इसी विचार को इस प्रकार सामने रखते हैं: “पानी अपनी प्याली का रंग अपना लेता है।” वास्तविक वजूद तो केवल एक अकेले अल्लाह का है। जिस प्रकार रौशनी एक है, हां वह अपनी रौशनी चारों ओर बिखेरती है और सारे जीव उसी रौशनी की तरंगित और प्रतिबिंबित होती लहरें हैं। जिस प्रकार बारिश की बूंदे टपकती हैं, जो पानी से भिन्न-भिन्न रूप में सामने आती हैं जैसे पानी, बर्फ और भाप की शक्ल में, वह एक ही पदार्थ की विभिन्न अवस्थाएं हैं। ठीक उसी प्रकार, चीजें और घटनाएं, जो भिन्न-भिन्न रूमों में जाहिर होती रहती हैं, वह उसकी एक अल्लाह का प्रकट रूप हैं।

आरंभिक सूफियों की तरह जिनकी मान्यता हमें तौहीद के ऊपर पुख्ता ईमान की ओर ले जाती थी, लेकिन जो मोतसव्विफा का समूह है जो वहदतुल वजूद को दार्शनिक संदर्भों में स्वीकारते हैं वह हो सकता है कि उन भावों को ठीक से प्रकट न कर सकें जिसका संबंध हुलूल और इत्तेहाद से है। वास्तव में, जब वह इस विषय को वैज्ञानिक एवं दार्शनिक रूप में बयान करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें इस प्रकार के नतीजों से अलग कर के नहीं सोचा जो सकता। वास्तव में, अपनी बात को कुरआन और हदीस की बुनियाद पर भी साबित करने की कोशिश करते हैं,

कुरआन की इन आयतों पर विचार कीजिएः

यह तुम नहीं थे जो झटके से घूमा; यह अल्लाह था। जब तुमने फेंकी (एक मुट्ठी भर धूल) यह तुम्हारा काम नहीं था बल्कि अल्लाह का था……..(अनफाल 8:17)

वास्तव में जो लोग तुम से अपनी वफादारी का अहद करते हैं वह उतनी ही वफादारी का अहद अपने अल्लाह से भी करते हैं……….(फतह 68:10)

यह वही अल्लाह है जिसने इंसान को पैदा किया और हम इस राज से भी वाकिफ हैं कि उनकी रूह की गहराई में क्या कुछ चलता रहता हैः हम उनकी शहे-रग भी ज्यादा करीब हैं। (क़ाफ़ 50-17)

हदीसें इस प्रकार हैं:

अल्लाह फरमाता हैः “ऐ इंसानो! मैं बीमार था मगर तुमने तीमारदारी नहीं की।” आदमी जवाब देता है, “मेरे अल्लाह! आप तो सारे जहान के मालिक हैं, मैं कैसे आपकी तीमारदारी कर सकता हूं? “तो अल्लाह जवाब देता है, “क्या तुम्हें इसका इल्म नहीं है कि मेरा फंला-फंला बंदा बीमार है लेकिन तुम उनसे मिलने और उसकी तीमारदारी करने नहीं कए। अगर तुम उनके पास जाते तो तुम मुझे वहां मौजूद पाते।”1

अल्लाह जो रहीमों करीम है, फरमाता हैः “……….मेरे बंदे मेरे करीब इस काम के अलावा और किसी काम से नहीं आते और जो तरीका मुझे बेहद प्यारा है वह है इबादत जो करने की जिम्मेदारी हमने उन पर रखी है और जो अपने अच्छे कामों के द्वारा मेरे करीब आते हैं ताकि मैं उन्हें अपना प्यार दे सकूं। जब मैं उन्हें प्यार करता हूं, मैं वह सुन रहा होता हूं जो कुछ वह सुनता है, वह देखता हूं जो वह देख रहा होता है, उसका हाथ बन जाता हूं जिससे वह हमला करता है, वह पांव बन जाता हूं जिससे वह चलता है।”2

यह संभव है कि इस प्रकार की और बहुत सारी हदीसें और कुरआन की आयतें इस बात को पुष्ट करने के लिए पेश की जाएं। लेकिन यह मान कर कि अगर हमने इस प्रकार विश्वास किया तो हम इस बहस को और आगे नहीं ले जाएंगे। इसलिए हम इस बहस को संक्षिप्त ही रखते हैं। साथ ही महान सूफियों के इस सवाल व जवाब के संदर्भ में पूरी तरह बता पाना संभव नहीं है। और न ही इसकी जरूरत है इसलिए हमने अपना ध्यान केवल कुछ बातों तक ही सीमित रखा है।

पहली बात, पहले उद्धत की गई दो आयतों को मुहकमात के खाने में रखा गया है अर्थात ये वे आयतें हैं जिसके सत्य बेहद स्पष्ट हैं इसलिए इसको लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं खड़ा किया जा सकता और यही उचित रास्ता है जिसके अनुसार कई दूसरे महान मुफस्सेरीन अर्थात कुरआन के व्याख्याताओं ने किया हैं

इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता कि ऊपर लिखित आयत में जिस कार्य का वर्णन किया गया है उसका सीधा संबंध स्वयं अल्लाह से है या उसके नबी से, या फिर यह कोई आश्चर्यजनक घटना थी या फिर एक ऐसा कार्य था जिसको अल्लाह के साथ जोड़ कर देखा गया और जो उसके सबसे प्रिय बंदे की प्रशंसा में कही गई; या फिर उसमें अल्लाह ने उनकी शक्ति एवं सामर्थ्य को बयान किया है, उसकी सच्चाई को पुष्ट करते हुए।

वास्तव में, वहदतुल वजूद की अतिरेकपूर्ण व्याख्या को पुष्ट करने के लिए ऐसा किया गया है, बजाए इसके कि इस बात को स्वीकार किया जाता और उस पर बल दिया जाता कि दुनिया में जो कुद मौजूद है उसका अपना वजूद है। काफिर और मोमिन, कातिल और मकतूल में फर्क को बताने के लिए महताब अर्थात अन्य पुरूष का इस्तेमाल किया गया हैः यह संभव है कि जीव की एकता को बताने की कोशिश की जाए केवल वृहद अवास्तविक व्याख्याओं के जरिये। खासतौर पर इस आयत से अर्थ निकालने के लिए………… “हम उसकी शहे-रग से भी अधिक करीब हैं।” वहदतुल वजूद के पक्ष में इससे पक्ष में इससे अर्थ निकालना असंभव है।

हदीस में जो बात बताई गई वह है पृथक होना और बहुलता न कि जीव की एकता। इस बात को स्वीकारने के लिए कि बंदा अर्थात अब्द एक दूर का तथा दूसरा जीव है जब तक कि वह अल्लाह से अपनी इबादत के जरिये कुरबत अर्थात निकटता को हासिल नहीं कर लेता। फिर उन दोनों की एकता के बारे में बात करना हुलूल और इत्तेहाद अर्थात उसमें समा जाना और एक हो जाना, उसे मोतसव्विफा भी कबूल करने के लिए तैयार नहीं है। यहां तक कि अल्लाह के शब्दों में उसे एक होने की पुष्टि की गई है और जीव का पृथक होना स्वीकार किया गया है।

तुम या तो सूरज हो या समुद्र हो; या तो तुम काफ़ पहाड़ या फोनिक्स हो

ये खुदा! जो इंसानी समण् से परे की चीज है!

तुम अंत तक बाकी रहने वाले हो और तुम असीमित हो।

फिर भी, चूंकि तुम कई रूपों में अपने को प्रकट करते रहते हों, दोनों जो उसके साथ एकात्म होता है या तुम जैसे दुसरे वह सब तुम्हारे आनंद में डूबे हुए हैं।

बिना और अधिक स पर टिप्पणी किए या इसकी व्याख्या किए जो कुछ भी यहां कहा गया है वह बहुलता और द्वैतवाद पर आधारित है, यह बात बेहद स्पष्ट है। हालांकि दूसरे लोग मोतसव्विफा के शब्दों में वहदतुल वजूद के प्रमाण ढूंढने की कोशिश करते हैं, मोतसव्विफा स्वयं अपने कार्यों की बहुलता को स्वीकार करते हैं। यानि अपने नफ्स को समाप्त करके। सिवाए कठिनाईयां और अनुशासन जुड़ा हुआ है और जिसका मकसद है कि अपनी कमियों पर काबू पाना और पूर्णता को प्राप्त करना। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह यह कि वे महान लोग वहदतुल वजूद को लेकर जो अतिवादी और दार्शनिक समझ पैदा है उससे खंडित करते हैं।

जब तक वहदतुल वजूद में यकीन करने वाले लोग इस बात को स्वीकार करते रहेंगे कि उन्हें अल्लाह के सामने जवाब देना है, तो फिर वह अमीर यानि सर्वोच्च एवं मामूर अर्थात उसके सहायक की भिन्नता को स्वीकार करता रहेगा। अपने का सहायक मान लेने के बाद वजूद की एकता पर बल देना यह विरोधाभासी बातें हैं। केवल कुछ काफिरों को छोड़ कर जो बंदगी का इंकार करते हैं, कोई भी मोमिन अल्लाह के सामने अपनी बंदगी का इंकार करने का साहस नहीं कर सकता। इसलिए जहां सूफियों की वहदतुल वजूद की समझ को लेकर बात है, वास्तव में उसका संबंध वहदतुल शहूद से है यानि देखने वाले की एकता या उसकी एकात्मकता से है। इसे सूफी मत की एक प्रभावी अवस्था माना जाता है। जो कुछ वह महसूस करते हैं उसकी शिद्दत यानि तीव्रता को इस्तेग़राक कहा गया है और जो कुछ सूफी बुजुर्ग हैं जिन्होंने वहदतुल वजूद को भिन्न-भिन्न अर्थ में समझने की कोशिश की है वह उनकी अपनी कमजोरियों का नतीजा है जो वह उकसी तह तक पहुंच पाने में असमर्थ रहे हैं। साथ ही इस्लाम में इसकी कोई जगह नहीं है और वास्तव में यह सब कुछ पश्चिमी यानि ईसाई और ग्रीक दर्शन की देन है।

यह आरोप स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, नव अफलातूनियों के प्रभाव में आकर, कुछ महान मुस्लिम विद्वानों ने इस्लाम में सर्वेश्वरवाद के विचार को सामने लाने की कोशिश की है। उसके बारे में सबसे अधिक बात यही कही जा सकती है कि हो सकता है कि उन मुसलमानों ने उसे अधिक घातक न समझा हो यह सोच कर कि अस्थायी तौर पर अगर इन नव अफलातूनियों से कुछ शब्दावलियों को अगर इस्तेमाल भी कर लिया जाए ताकि वह अपने मुशाहिदात अर्थात अपनी दृष्टि और समझ को व्याख्यायित कर सकें। नहीं तो उन दोनों प्रकार के लोगों ने अल्लाह के वजूद की समझ को लेकर आसमान और जमीन का फर्क है।

एक समूह के लोग जिन्होंने दुनिया और कयामत के बीच संतुलन को प्राप्त किया था और वह संतुलन जिसका वर्णन कुरआन में किया गया है वह मृतवस्सिफा के वहदतुल वजूद की जो अवधारणा हे उससे कभी सहमति प्रकट नहीं करेंगे।

1. एक अल्लाह में यकीन करना कि वही सब कुछ है और हर जगह मौजूद है उसका यह अर्थ होगा कि इस बात को स्वीकार कर लिया जाए कि वह जो सबसे बेकार ओर बेमानी चीज है वह भी अल्लाह ही है। उस दुरूहता को हर हाल में अस्वीकार किया जाना चाहिए।

2. कुरआन दुनिया से अल्लाह के वजूद के एक होने की कई शहादतें पेश करता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि जो दूनिया रची गई है वह साबित है अर्थात वह पूर्ण रूप से स्थापित है।

3. कुरआन की कई आयतों में इस बात पर बल दिया गया है कि यह दुनिया एक दिल खत्म होने वाली है और उसके बाद एक नई दुनिया का वजूद कायम होगा। जब तक कोई चीज मौजूद नहीं है तो फिर उसका तबाह होना और समाप्त हो जाना बेमानी हो जाता है। किसी चीज की तबाही के बारे में बात करना जिसकी सत्यता साबित नहीं है वह दुरूह और बेकार है। कुरआन इस प्रकार की दुरूहताओं एवं निरर्थकता से परे है।

4. सारे पैगम्बर जो इस दुनिया में तशरीफ लाए हैं वे हमे इसी बात की शिक्षा देते रहे हें कि सारे जीवन चाहे वह छोटा या बड़ा उसे बाद में पैदा किया गया है और अल्लाह और बाकी सारे जीवों का रिश्ता केवल एक पैदा करने वाले और पैदा किए जाने वाले का है। मोतसव्विका ने वहदतुल वजूद को किस प्रकार समझने की कोशिश की है, तो फिर पैगंबरों ने जो अल्लाह के संदेश दिए हैं उसे एक प्रकार से झूठा बताना और उसका इंकार करना होगा जो दिल और दिमाग दोनों के लिए काबिले नफरत बात है।

5. हर साक्ष्य को इसलिए पेश किया गया है ताकि वहदतुल वजूद के साधारण एवं शाब्दिक अर्थ को सामने लाया जाए, वास्तव में वह जीव की बहुलता के तर्क को ही अधिक बल प्रदान करता है।

6. कुरआन की कई आयतों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि एक बड़ी संख्या में लोग ऐसे होंगे जो उन्हें कयामत के दिन अपनी नेकी के एवज तरह-तरह के इनामात से नवाजा जाएगा और विद्रोहियों को सजा दी जाएगी। अगर हम जीव की एकात्मकता को स्वीकार करते हैं तो फिर ऐसे किसी भी फैसले की संभावना ही नहीं बनती क्योंकि प्रश्नों का उत्तर देना असंभव होगा कि कौन आज्ञाकारी है और रहमत यानि नेमत क्या है और यह कहां हैं दोषी कौन है और उसकी सजा क्या है। इत्यादि।

7. अगर हर चीज को अल्लाह ही का रूप मान लिया जाए और घटनाओं को उसी का प्रकटीकरण स्वीकार किया जाए, फिर तो बुतों और बुत पूजने वालों को आलोचना का शिकार बनाने का कोई हक नहीं पहुंचता। क्योंकि फिर तो सारी घटनाएं उसी का रूप है तो फिर बुत ओर बुत पूजने वाला भी उसी का एक रूप है उससे अलग नहीं है। दूसरी ओर, कुरआन और सुन्नत में जिस तौहीद यानि अल्लाह के एक होने की बात की गई है, वह तो बुत और बुत पूजने वाले का कट्टर दुश्मन है।

8. अगर जिस प्रकार से मोतसव्विफा, वहदतुल को वजूद को स्वीकार करते हैं उस प्रकार स्वीकार कर लिया जाए तो फिर इस बात को स्वीकारना होगा कि पदार्थ कदीम अर्थात अंतहीन है, जिसे लोगों की समझ यानि बिल इजमा की बुनियाद पर इसे कुफ्र मान लिया जाएगा और जो लोग वास्तव में “अल्लाह के लोग” हैं वे इस प्रकार का कुफ्र करने से कोसों दूर हैं।

मोतसव्विफा ने वहदतुल वजूद को जिस प्रकार समझा है उसमें स्पष्ट अंतर है और फिर उस अवधारणा को शाब्दिक एवं दार्शनिक रूप से स्वीकार करना सर्वेश्वरवाद को स्वीकारने जैसा होगा। यानि फिर दोनों के बीच एक समानता मौजूद है। दार्शनिक रूप से इसका अर्थ तो यही निकलता है कि ईश्वर और दुनिया एक ही जीव है, केवल एक स्थान है जो उन्हें दो भागों में बांटती हैः

1. अल्लाह एक वास्तविक हस्ती है और दुनिया कुछ नहीं है सिवाए इसके कि यह उसके कुछ तज़हूरात अर्थात कुछ चीजों या रूपों का जमा कर देना है या उसको व्यवस्थित ढंग से सामने ला देना है। यही वह विचार है जिसको स्पिनोजा और उसके अनुयायियों ने स्वीकारा है।

2. केवल दुनिा वास्तविक है। अल्लाह सारी मौजूद चीजों का मजमुआ अर्थात संग्रह है। यह विचार प्रकृतिवादी सर्वेश्वरवादियों का है और जिसे कभी-कभी हेगेल और उसके अनुयायियों के साथ जोड़ कर देखा जाता है।

सारांश के तौर पर कहें तो अंतर यह हैः मोतसव्विफा जब फिना का अनुभव करते हैं तो फिर वे दुनिया की वास्तविकता का इंकार करते हैं और दार्शनिक समूह दुनिया के रचेयिता के वजूद का इंकार करते हैं और उसे एक ओर रखने की कोशिश करते हैं। जबकि मोतसव्विका का वहदतुल वजूद की जो समझ है वह वहदतुल शहूद से संबंध रखता है, इसकी दूसरी समझ वहदतुल मौजूद के साथ जोड़ कर की जाती है। पहला समूह, अपनी प्रभावी अवस्था यानि हाल, मुशाहेदा अर्थात दृष्टि, इस्तेगराक यानि डूब जाना को ठीक प्रकार से व्याख्यायित न कर पाने के कारण मुतशाबिहात अर्थात उपमा एवं रूपक कह बैठते हैं। दूसरा समूह इस अवधारणा को सिद्धांत रूप में सामने लाता है, और उसे एक औपचारिक दर्शन, या विज्ञान बताने की कोशिश करता है। जबकि पहला शुरू करता है अल्लाह से और फिर उस पहलू से मौजूद चीजों एवं घटनाओं का अवलोकन करता है, जबकि दूसरा समूह विषय के साथ जो उनके अनुभव रहे हैं उससे आरंभ करता है, इस प्रकार वह ईश्वर को मौजूद चीजों पर निर्भर बना देता है। जहां पहले पहले के ऐतबार से अल्लाह का प्रत्यक्ष अनुभव होता है अर्थात जौक को अनुभव करता है, जबकि दूसरे का मामला केवल सिद्धांत एवं अटकलबाजी तक सीमित रह जाता है। जबकि पहला पक्ष अपने अहं को मार कर पूरी वफादारी के साथ ईश्वर के आगे झुक जाता है, तो दूसरा पक्ष अपने वजूद को वाजिबुल वजूद के दर्शन में उलझा कर रख देता है।

अब अल्लाह ही को मालूम है कि क्या बेहतर हैं।

source: https://fgulen.com/hi_in/pustaken/unicode-islam-ke-vishay-2/51188-aachaareeti-evan-aadhyaatmikata

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