इस्लाम में ईद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि Historical Account of Eid

गुलाम रसुल देहलवी

ईद एक इस्लामी त्योहार है जो शांति, दया, भाईचारे और सभी धर्म के अनुयायियों के बीच समानता का संदेश देता है। यह त्योहार हर साल रमज़ान के अंतिम में इस लिए मनाया जाता है ताकि तीस रोजों (उपवास) की समाप्ति की खुशी में रोज़ादार अल्लाह का शुक्रिया अदा करें। इसे गरीबों को सदक़ा और फ़ित्र (दान) बांटने के त्योहार के रूप में भी मनाया जाता है। इसीलिए इस त्योहार का पूरा नाम अरबी में “ईद-उल-फ़ित्र” है। फ़ित्र का अर्थ है: ‘ग़रीबों को ईद मनाने के लिए अमीर कि तरफ से दिया जाने वाला दान’। इस तरह ईद-उल-फ़ित्र गरीबों के लिए भाईचारे की भावना और सहानुभूति प्रकट करने का प्रतीक है।

ईद में स्वादिष्ट पकवान और नए नए लिबास की खास व्यवस्था की जाती है और परिवार समित दोस्तों के बीच तोहफ़ों का आदान-प्रदान होता है। परंतु यह इस्लामी त्यौहार फैंसी कपड़े पहन्ने और केवल दावतें खाने के लिए नहीं, बल्कि समाज में एक मानवीय भावना को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है।

मूल रूप से ईद विश्व बंधुत्व को बढ़ावा देने का त्योहार है। इसी लिए हज़रत मुहम्मद (स.अ.) ने इस त्योहार को सभी धर्म के लोगों के साथ मिलकर मानाने और सबके लिए खुदा से सुख-शांति और बरकत की दुआएं मांगने की तालीम दी है।

इस्लाम में मानव समाज के सदस्यों और विभिन्न वर्गों के बीच भाईचारा स्थापित करने पर काफी बल दिया गया है। यही कारण है कि पैगंबर मुहम्मद साहब ने भाईचारे की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए अरबी शब्द ‘उम्मत’ का प्रयोग किया, जो सभी धार्मिक समुदायों, जातियों, जातीय जनजातियों और सामाजिक तबकों को शामिल है।

इस्लाम में ईद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लामी सभ्यता, समाज और सामूहिक जीवन के विकास में इस त्यौहार की शानदार भूमिका रही है। ईद मानाने का मुबारक सिलसिला मदीना मुनव्वरा में हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के जीवन के अव्वल दौर में शुरू हो गया था। इसका उल्लेख हदीस की किताब सुन्न अबी दाऊद में इस तरह मिलता है: ”हज़रत अनस से रवायत है कि मदीना के लोग दो खास दिन उत्सव के तौर पर मनाया करते थे, जिनमें वे खेल तमाशे क्या करते थे। रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने उनसे पूछा: ”यह दो दिन जो आप मनाते हो, उनकी वास्तविकता क्या है? उन्होंने बताया: हम जाहिलियत के दौर में (यानी इस्लाम से पहले) यह पर्व इसी तरह मनाया करते थे। तब रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया: ”अल्लाह ने तुम्हारे इन दोनों त्योहारों के बदले में तुम्हारे लिए उनसे बेहतर दो दिन निर्धारित कर दिए हैं: ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-ज़ुहा।

वास्तविकता यह है कि पैगंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) का जन्म अरब में इस लिए हुआ ताकि वहां जिहालत और नफरत को मिटाकर प्यार, सहिष्णुता और मानवता का पैग़ाम दिया जाए। उन्होंने अरब जगत में जारी हर तरह के आतंकवाद, असहिष्णुता, ज़ुल्म व ज़ियादती को खत्म करके पूरी मानवता के लिए प्रेम, रहमत और स्नेह का सन्देश दिया। रूहानियत (भक्ति) और इबादत (पूजा) के साथ साथ सामाजिक सेवा पर न सिर्फ बल दिया बल्कि खुद इस का प्रतीक बनकर मनुष्य की सेवा को भक्ति पर भी प्राथमिकता दी। ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की आवश्यकताओं को पूरा करने में किसी भी तरह धार्मिक या सामाजिक पूर्वाग्रह से लोगों को बचने की तालीम दी।

ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-ज़ुहा की तरह विश्व भर के मुस्लिम समुदाय में एक और त्योहार  मनाता है, जिसे “ईद मिलादुन्नबी” कहा जाता है। ईद मिलाद-उन-नबी अर्थात् पैगंबर मुहम्मद  का जन्मदिन  इस्लामी महीने रबी ‘अल-अव्वल के बारहवें दिन हर साल मनाया जाता है।

ग़ुलाम रसूल देहलवी एक इस्लामिक शोधकर्ता, लेखक और वक्ता हैं। वह अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी और उर्दू भाषाओं में कई किताबें और लेख लिख चुके हैं। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और सेमिनारों में धार्मिक और राजनीतिक संबोधित किया है। उनके कॉलम कई भारतीय अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं।

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