ईद उल अजहा(बकर ईद): बलिदान और त्याग का प्रतीक

वर्षा शर्मा, वर्ड फार पीस
ईद-उल -अज़हा मुसलमानों का एक प्रसिद्ध त्यौहार है जिसे बकरीद अथवा ईद-उल-कबीर के नाम से भी जाना जाता है. यह त्यौहार बलिदान अथवा कुरबानी का प्रतीक है. हर साल यह मुस्लिम माह ज़ुल हिज्जा के दसवें दिन मनाया जाता है.
प्यार का दूसरा नाम बलिदान है। ईश्वर इब्राहिम के विश्वास, उनकी निष्काम भक्ति, प्रेम और समर्पण का परिक्षण  करना चाहते थे. मान्यता है कि इब्राहिम ने एक स्वपन देखा जिसमें उन्हें ईश्वर की और से हुक्म आया कि वह अपनी सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति अर्थात अपने एकलौते पुत्र का बलिदान दें.
इस विषय में जब इब्राहिम ने इस्माइल को बताया तो वे तत्काल हॅसते- हॅसते कुर्बान होने के लिए तैयार हो गए. लेकिन ईश्वर भी दयालू व कृपालु है और वह अपने बंदे के दिल के हाल को बखूबी जानता है। इब्राहिम ने जैसे ही छुरी उठाई आकाश में एक रौशनी दिखाई पड़ी और उस दिव्य प्रकाश ने इब्राहिम से बात की की और कहा कि तुम्हारा बलिदान पूरा हो चुका। ईश्वर तुमसे प्रसन्न हुए है और तुम्हारे प्रिय पुत्र को जीवनदान दिया है.लिहाज़ा तब से लेकर आज तक यह त्यौहार मनाया जाता है
 ईद उल अज़हा समारोह के दौरान मुस्लिम भेड़, बकरी, ऊँट जैसे जानवरों  की क़ुरबानी  देते समय इब्राहिम की आज़माइश और बलिदान को याद करतें हैं.
यहां ये समझना बहुत ज़रूरी है कि जानवरों की क़ुरबानी के रूप में दिया गया बलिदान न तो हमारे पिछले गुनाहों को खत्म कर सकता है और न ही हमारे प्राश्चित का ज़रिया बन सकता है.
कुरआन कहता है कि: “न ही उनका मांस और न ही उनका खून है जो रब तक पहुँचता है यह तुम्हारी भक्ति और तक़वा है जो उस तक पहुँचती है”.(कुरान 22:37)
जानवरों की क़ुरबानी देना सिर्फ एक अनुष्ठान और पवित्र धार्मिक परम्परा है जिसका अभ्यास  करके इब्राहिम के त्याग और बलिदान को याद किया जाता है जबकि इस प्रथा का सार और इसकी भावना साधारण मनुष्य की समझ से परे है.
इस्लाम धर्म में  बकरे की कुर्बानी देकर मनाया जाने वाला यह त्यौहार हमेशा दूसरे धर्मों के लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाता है। जिन लोगों को इस धर्म तथा कुबानी के वास्तविक सार का पूर्ण ज्ञान नहीं है, वे नहीं जानते कि क्यों बकरे की कुर्बानी देने का महत्व है।
क़ुरबानी का वास्तविक अर्थ यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए किया गया हो. इस दिन किसी बकरे या जानवर की क़ुरबानी तो महज़ एक उदाहरण है. असल में क़ुरबानी तो हर व्यक्ति और औरत को जीवन भर करनी होती है.
ईश्वर को हमारे बलिदान और त्याग की क्या ज़रुरत? वह हमसे सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी चाहता है.यह  त्यौहार है कि ताकि हम अपने दोस्तों के साथ अपने संबंधों को मज़बूत कर सकें, जो लोग ज़रूरत में हैं उनकी मदद कर सकें, परोपकार व अच्छे कर्म कर सकें। यह त्यौहार हमें बताता है की कैसे मानवता की सेवा और ईश्वर की इच्छा के प्रति सवयं को समर्पित करें।
कुर्बानी का अर्थ है कि देश रक्षा के लिए सदा तत्पर रहना। हजरत मुहम्मद साहब का आदेश है कि कोई व्यक्ति जिस भी परिवार, समाज, शहर या मुल्क में रहने वाला है, उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह उस देश, समाज, परिवार की रक्षा के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार रहे।
  हर दिन हमारे पुलिस अधिकारी हमारी रक्षा करने के लिए अपना जीवन जोखिम में डालते हैं.  लाखों सैनिकों ने  हमारे देश को अंग्रेज़ों के ज़ुल्म व सितम से आज़ादी दिलाने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी और  अपने जीवन का बलिदान दिया है.  हमारे भारतीय व मुस्लिम स्वतन्त्रता सैनानी यदि अपनी जान की बाज़ी न देते तो गुलामी की बेडिय़ों में जकड़ा भारत को कभी खुली हवा में सांस लेने का मौका नहीं मिलता। मैं सभी मुस्लिम बहन- भाइयों से आग्रह करती हूँ कि ईद उल अज़हा के इस मौके पर हमें आजादी के इन मतवालों को याद करना चाहिए , जिनके बलिदान से भारतीयों को अंग्रेज़ों से मुक्ति मिली थी।
बेहतर ये होगा कि इस मौके पर हम सभी पुलिसकर्मियों, गरीबों, ज़रूरतमंदों, अनाथों को अपने घर पर बुलाएँ और उनके कार्यों तथा बलिदानों की सराहना करें जिन्होंने मानवता के लिए बलिदान दिए। यही इस त्यौहार का भाव है. इसका मतलब यह है कि इस्लाम व्यक्ति को अपने परिवार, अपने समाज और अपने देश के दायित्वों को पूरी तरह निभाने पर जोर देता है।

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