ईद मिलादुन्नबी: सहिष्णुता का संदेश

By Ghulam Rasool Dehlvi, Word for Peace

गुलाम रसूल देहलवी

ईद-उल-फ़ितर और ईद-उल-जुहा ी तरह मुस्लिम समुदाय देश में एक और त्योहार  मनाता है, जिसे ईद मिलादुन्नबी कहा जाता है। इस साल ईद मिलाद-उन-नबी अर्थात् पैगंबर मुहम्मद  का जन्मदिन  24 दिसंबर को है। यह इस्लामी महीने रबी ‘अल-अव्वल के बारहवें दिन हर साल मनाया जाता है।

570 ईसवीं को मक्का शहर में पैगंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) नफरतों को मिटाकर प्यार,  सहिष्णुता और मानवता की सेवा को आम करने के लिए पैदा हुए। उन्होंने अरब जगत में जारी हर तरह के आतंकवाद,असहिष्णुता, ज़ुल्म व ज्यादती को  खत्म करके पूरी मानवता के लिए प्रेम, रहमत और स्नेह का सन्देश दिया। उन्होंने अपने पूरे जीवन में इश्वर की भक्ति, पूजा और धार्मिक इबादत के साथ साथ सामाजिक सेवा पर न सिर्फ बल दिया बल्कि खुद इस का पालन करके मनुष्य की सेवा को भक्ति पर भी प्राथमिकता दी। ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की आवश्यकताओं को पूरा करने में किसी भी तरह धार्मिक या सामाजिक पूर्वाग्रह से लोगों को बचने की तालीम दी।

हज़रत मुहम्मद (स.) की महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि किसी भी धर्म का अपमान न किया जाए और न ही किसी इबादतख़ाने या पूजा स्थलों को नुकसान पहुँचाया जाये, चाहे वोह मस्जिद हो या मंदिर, गिरजाघर हो या गुर्दुवारा। उन्हों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाकर इश्वर की सच्ची भक्ति नहीं की जा सकती।

हज़रत मुहम्मद (स.) की सहिष्णुता और धैर्य का इससे बढ़कर और क्या उदाहरण होगा कि एक बूढ़ी औरत, जो आपके पड़ोस में रहती थी, आप पर कूड़ा डालती रही लेकिन आपने अपना रास्ता नहीं बदला और न ही उसे कुछ खरी खोटी सुनाई, बल्कि जब वह बीमार हो गई तो आप खुद उसकी सेवा के लिए गए।

आइये आज ईद मिलादुन्नबी के मौके पर हज़रत मुहम्मद (स.) के मार्ग पर चलते हुए कोशिश करें कि अपने क्षेत्र के ग़रीब मुहल्लों, झुग्गियों, झोपड़ियों और अस्पतालों में पहुंचे और मरीजों की देख रेख और मदद करें और संभव हो सके तो उन्हें कुछ तोहफे और फल अतियादी पेश करें। इस तरह दुन्या को यह सन्देश मिलेगा कि ईद मिलादुन्नबी उस हस्ती के आगमन की खुशी का दिन है जो सभी के लिए रहमत और उल्लास के दूत बनाकर भेजे गए।

आज मुस्लिम जगत में इस्लाम के नाम पर जारी धार्मिक कट्टरपंथी ने दुन्या भर में ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि एक गैर मुस्लिम भाई किसी भी मुसलमान का नाम सुनते ही दहशत में आ जाता है और इस प्रकार आज का मुस्लमान दूसरों से नफरत का शिकार हो जाता है। हकीक़त यह है कि धार्मिक कट्टरपंथी न इस्लाम की शिक्षा है और न ही किसी अन्य धर्म की। मुहम्मद (स.) ने ऐसे तरीके कभी नहीं अपनाए कि बंदूक की नोक और तलवार के ज़ोर पर जबरन अपना धर्म स्वीकार कराया जाए। यह इस्लाम और पैगंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) की सब से बड़ी गुस्ताखी और उनके मार्ग से बग़ावत है। मुसलमानों को चाहिए कि ऐसी हर विचारधारा को इस गंगा-जमुनी समाज के हर हिस्से से ख़त्म करें जो धर्म के नाम पर हिंसा और कट्टरवाद फैलाती है और साथ ही खुद भी हज़रत मुहम्मद (स.) कि जीवनशैली अपना कर विश्व के सामने इस्लाम की सहिष्णुता की सही तस्वीर पेश करें। यही वो मार्ग है कि जिस से आज धार्मिक कट्टरता और अराजकता से मुक्त हुआ जा सकता है।

आज ईद मिलादुन्नबी का संदेश यह होना चाहिए कि कोई भी धर्म असहिष्णुता, बैर, नफरत और अराजकता की सीख नहीं देता। धर्म की पोशाक ओढ़ कर अमानवीय हरकत करने वाला सबसे पहले अपने ही धर्म का विद्रोही और दोषी है इसलिए जरूरी है कि ऐसे लोगों के खिलाफ पहले ही उसी मज़हब के जिम्मेदार आगे आएं।

गुलाम रसूल देहलवी सूफीवाद से जुड़े एक इस्लामी विद्वान और अंग्रेजी-अरबी-उर्दू-हिन्दी लेखक हैं।

Email Id: grdehlavi@gmail.com

Mob: 08285792316

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