ज़मीर को झिंझोड़ने वाला एक ज़बर्दस्त वाक़या

By Word for Peace

रात का आखरी पहर था और तेज बारीश के साथ साथ सर्दी का तो पूछिये ही मत हड्डीयों मे घुसी जा रही थी।
मे अपनी कार मे एक दूसरे शहर से कारोबारी दौरे से वापस अपने शहर आ रहा था।
कार के दरवाजे़  बंन्द होने के बावूजूद मे सर्दी महसूस कर रहा था
दिल मे एक ही ख्वाहिश थी के बस जल्दी से घर पहुंच जाऊं और बिस्तर में घुस कर सो जाऊं।
सडकें बिल्कुल सूनसान थीं यहां तक के कोई जानवर भी नज़र नही आ रहा था।
लोग इस सर्द मौसम मे अपने गरम बिस्तरों में दुबके हूऐ थे।

जैसे ही मैने कार अपनी गली की तरफ मोडी तो मुझे कार की रोशनी मे भीगती बारिश मे एक साया नजर आया।

उसने बारिश से बचने के लिये सर पर प्लास्टीक के थेले जेसा कुछ औङ  रखा था। ओर वो गली मे रुके हूऐ पानी से बचते हूऐ आहीस्ता आहीस्ता जा रहा था। मुझे बहुत हैरानी हुई के इस मौसम मे जब के रात का बिल्कुल आखरी वक्त है, कौन अपने घर से बाहर निकल सकता है ? मुझे उस पर तरस आया के पता नही किस मजबूरी ने इस को ऐसी तुफानी बारीश मे बाहर निकलने पर मजबूर किया है ???  हो सकता है कि घर में कोई बिमार होगा और यह उसे अस्पताल लेजाने के लिए कोई सवारी ढूंढ रहा होगा।

मैने उस के करीब जा कर गाडी रोकी ओर शीशा नीचे करके पुछा,

“क्या  बात है भाई साहब आप कहां जा रहो हो ? सब ठीक तो है ? ऐसी कौनसी मजबूरी आगई के ऐसी तैज़ बारिश और इतनी देर रात सदीॅ में आपको बाहर निकलना  पङा ? आइये मे आप को छोङ देता हूँ ” ।

उसने मेरी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए कहा,

“भाई बहुत बहुत  शुक्रिया,  मैं यहां क़रीब ही  जा रहा हूं  इसलिये पैदल ही चला जाऊंगा “।

मैने पुछा “लेकिन आप ऐसी सर्दी और बारिश मे जा कहाँ रहे हो ” ?

उस ने कहा – “मस्जिद” _ _ _

मैने पुछा …..”इस वक्त ???
इस वक्त मस्जिद मे जा कर क्या करोगे ” ?

तो उस ने जवाब दिया कि ,,,
“में इस मस्जिद का मुअज़्ज़िन  हूं और फजर की अज़ान देने के लिये जा रहा हूं “

ये कह कर वो अपने रास्ते पर चल पडा ओर मुझे एक नई सोच मे गुम कर गया।

क्या आज तक हमने कभी ये सोचा है के सख्त सर्दी की रात मे तूफान हो या बारिश, कौन है जो अपने वक्त पर अल्लाह के बुलावे की सदा बुलन्द करता है ??? कौन है जो ये आवाज़ बुलन्द करता है कि …

आऔ नमाज की तरफ,,,,
आओ कामयाबी की तरफ,,,,
और उसे इस कामयाबी का कितना यक़ीन है कि उसे इस फर्ज़  के अदा करने से ना तो सर्दी रोक सकती है और ना ही बारिश।
जब सारी दुनिया अपने गरम बिस्तरों में नींद के मज़े ले रही होती है,,,
तब वो अपने फर्ज़  को अदा करने के लिये उठ जाता है।
और आज तक कभी हमने यह सोचा कि उनकी तनख्वाह कितनी होगी  ?
शायद 4000 से 6000 रुपये ।
एक मज़दूर भी  रोज़ाना  400 रुपये के मुताबिक  माहाना 12000 रुपये कमा लेता है ।

तब मुझे यक़ीन हुआ के ऐसे ही लोग हैं जिन की वजह से अल्लाह हम पर मेहरबान है
इन ही लोगों की बरकत से दुनिया का निज़ाम चल रहा है।

मेरा दिल चाहा के नीचे ऊतर कर उस को गले लगाऊं,  लेकिन वो जा चूका था।

और थोडी ही देर के बाद फिज़ा  . . “अल्लाहू – अकबर”  की सदा से गूंज उठी  और मेरे कदम घर जाने के बजाए मस्जिद की तरफ उठ गए।
और आज मूझे सर्दी मे नमाज़ के लिये जाना गरम बिस्तर और नींद से भी ज्यादा  अच्छा लगता है ।

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  1. Very heart touching post indeed

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