पश्चिम एशिया में अमन की नई आशा

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ग़ुलाम रसूल देहलवी

प्रधानमंत्री मोदी के फिलिस्तीन के हालिया दौरे को ‘ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण’ बताया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने ट्वीट किया कि “पहली बार फिलिस्तीन पहुंचे भारतीय  प्रधानमंत्री की यह इतिहासिक यात्रा रही”। उन्होंने ये भी लिखा कि  पीएम के  विवेकपूर्ण नेतृत्व को मान्यता देते हुए  फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने उन्हें ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ पुरस्कार से सम्मानित किया जिसे फिलिस्तीन का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।

वास्तव में, ये सम्मान न सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए प्रशंसा की बात है बल्कि ये पुरस्कार सभी भारतियों के लिए सम्मान की बात है। यह उन पुराने रिश्तों को मजबूत बनाने कि ओर एक क़दम है जिनकी बुन्याद पर हिन्दुस्तान ने फिलिस्तीन की आज़ादी के लिए हमेशा ज़ोर दिया है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत ने फिलिस्तीन की आज़ादी को विश्व के अन्य स्वतंत्र देशों की तरह मज़बूत किया है।

1948 के अरब-इज़राइल युद्ध के बाद भारत ने इज़राइल के साथ अपने सारे सम्बन्ध समाप्त कर दिए थे। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आते ही फिलिस्तीन के साथ-साथ भारत- इज़राइल सम्बन्ध भी मज़बूत हुए। हाल में भारत और इजरायल बेहद करीब आए हैं, लेकिन अरब देशों के लिए इजरायल की स्थिति एक शत्रु देश जैसी है। इजरायल सरकार से लंबे संघर्ष में उतरे फिलिस्तीनियोंं के लिए भारत का इजरायल-समर्थक रुख एक बड़े धक्के जैसा था। फिलि‍स्तीन के साथ भारत के रिश्ते पारंपरिक रूप से बहुत अच्छे रहे हैं। ऐसे में इजरायल से बढ़ती नजदीकी को ध्यान में रखते हुए फिलि‍स्तीन को आश्वस्त करना जरूरी था कि हमारी नजर में उसका महत्व भी पहले से कम नहीं हुआ है।

दरअसल मोदी सर्कार का यह मानना है कि नए दोस्त बनाने का मतलब ये कतई नहीं की हम पुरानी दोस्तियों को समाप्त कर दें।

इसी उसूल को आधार पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रस्ताव के दौरान  इजरायल की राजधानी के तौर पर जेरूसलम को मान्यता देने  तथा अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से जेरुसलम स्‍थानांतरित करने जैसे फैसलों पर अमेरिका का समर्थन नहीं किया। यह निश्चित रूप से भारत और फिलिस्तीन के एतिहासिक सम्बन्ध की मज़बूती को दर्शाता है। फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने स्वयं ज़ोर देकर कहा, “किसी भी मुल्क को अन्य मुल्कों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का अधिकार है” ।

यही नहीं बल्कि ‘पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन’ (पीएलओ) के कार्यकारी समिति के सदस्य, अहमद मजदलानी जैसे लोग भारत-इज़राइल के संबंधों को  सकारात्मकता और आशावादी नज़रिये से देखते हैं। उनका ये मानना है कि भारत-इज़राइल के बीच बेहतर रिश्ते वास्तव में फिलस्तीनियों को फायदा पहुंचा सकते हैं। येरुशलम का अख़बार “दी जेरूसलम पोस्ट” ने मजदलानी का हवाला देते हुए लिखा है कि “भारत-इज़राइल के बीच बढ़ते सम्बंध फिलिस्तीन के लिए सकारात्म हो सकते हैं, क्युकी इन बढ़ते संबंधों के चलते भारत फिलिस्तीन के पक्ष में इज़राइल पर ज़ोर डाल सकता है।

प्रधानमंत्री के इस दौरे से मुस्लिम समुदाय तक ये सन्देश पहुँचता है कि भारत, फिलस्तीनियों और मुसलमानों की खातिर इज़राइलियों और यहूदियों का समर्थन नहीं करता। पश्चिम एशियाई पर अध्यन कर रहे भारतीय मुस्लिम शोधकर्ता डाक्टर अरशद आलम का मानना है कि, “राजनयिक क्षेत्र में ऐसी धारणा पाई जाती है कि हिंदुस्तान, इज़राइल के कुछ ज़्यादा ही क़रीब आ रहा है और पाकिस्तान इस स्थिति का फायदा उठाएगा। पीएम् मोदी की फिलिस्तीन यात्रा का उद्द्देश्य इन सभी परेशानियों से आराम देना है”।

भारत के प्रमुख उर्दू दैनिक ‘इन्क़िलाब’ के एडिटर शकील शम्सी “राम-अल्लाह की ज़मीन पर अमन कि नई उम्मीद” के शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखते हैं: “भारतीय मुसलमानों को उम्मीद है कि फिलिस्तीनी और इजरायली पक्षों के बीच चौतरफा हल की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रधानमंत्री का यह दौरा अहम् साबित होगा”

ETV उर्दू के वरिष्ठ संपादक तहसीन मुनव्वर उर्दू दैनिक इन्क़िलाब में लिखतें हैं: “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फिलिस्तीन की यात्रा फिलिस्तीन-इज़राइल मुद्दे के समाधान के लिए उम्मीद की एक किरण है। फिलिस्तीन-इज़राइल विवाद के समाधान क लिए भारत एक ऐसी राह की तलाश रहा है जो पुरानी हिंदुस्तानी नीतियों से थोड़ा अलग तो हो, लेकिन पूर्ण रूप से उसके विरुद्ध भी न हो”।

जेएनयू के प्रोफेसर, पी आर कुमार स्वामी का मानना है कि, ब्रिटिश से आजादी के बाद  हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच फिलिस्तीन के समर्थन को लेकर प्रतिस्पर्धा पैदा हो गयी थी, क्यूंकि पाकिस्तान का यह मानना था की भारत, इज़राइल के ज़्यादा क़रीब है। लेकिन जब पाकिस्तान ने इस्लाम के नाम पर राजनीती चलानी चाही तो भारत ने बड़े ही स्पष्ट ढंग से अपनी रिवायत क़ाएम की। हिंदुस्तान का मौक़िफ़ सेकुलरिज्म पर था जिसकी वजह से आम हिंदुस्तानी, फिलिस्तीन का हामी था।

1948 के अरब-इज़राइल संघर्ष में इज़राइल और अरब देशों (मिस्र, जॉर्डन, इराक और सीरिया) के बीच ज़बर्दस्त राजनैतिक तनाव तथा सैन्य संघर्ष जारी रहा। इस संघर्ष का मूल कारण 19वीं शताब्दी के अन्त में यहूदीवाद तथा अरब-राष्ट्रवाद का उदय था। फिलिस्तीन के क्षेत्र को बचाने के लिए अरब राज्यों के सैन्य गठबंधन ने यह पहली जंग लड़ी थी। इन अरब देशों की कोशिश थी कि इजरायल पर हमला कर फिलिस्तीन-इज़राइल मुद्दे (Israel Palestine Conflict) को ही खत्म कर दिया जाए। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। इजरायल ने अरब देशों को युद्ध में हरा दिया। नतीजा ये हुआ कि इजरायल की सीमा में काफी इजाफा हो गया, वहीं फलस्तीन के कई इलाकों पर जॉर्डन और मिस्त्र का क़ब्जा हो गया। इस युद्ध के बाद फलस्तीन का अस्तित्व समाप्त ही हो गया। ऐसे कठिन समय में भी भारत ने फिलिस्तीन के लोगों का साथ दिया।

1974-75 में पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को फलस्तीनियों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला भारत पहला ग़ैर-अरब देश था। उस समय फिलिस्तीन के लोगों के लिए काफी कठिन दौर था जब उनके नेता यासिर अराफात पर इजराइल कि तरफ से यह इलज़ाम लगा कि वो ‘आतंकवादी’ हैं। लेकिन उस वक़्त भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने यासिर अराफात के नेत्र्तव के साथ मजबूत सम्बन्ध बनाये और प्रभावी ढंग से 1980 में फिलिस्तीन दूतावास को भारत में मान्यता दी। तत्पश्चात, हिंदुस्तान ने इज़राइल के साथ उपनिवेश शक्ति के तौर पर राजनयिक संबंध तोड़ लिए और फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता दी।

इस में दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी की फिलिस्तीन यात्रा इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद सुलझाने और शांति प्रक्रिया स्थापित करने में मुख्य भूमिका अदा कर सकती है। पश्चिम एशिया में भारत लम्बे समय से अमन की स्थापना में प्रतिबद्ध रहा है। ये उचित समय है कि वर्तमान भारतीय सरकार इस क्षेत्र में अपने ऐतिहासिक संबंधों को और मज़बूत बनाये। पश्चिम एशिया में चुनौतियों पर लगातार राजनीतिक स्तर पर बातचीत चलाना और इसे शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना भले ही एक कठिन काम है, परन्तु एक विवेकपूर्ण नेतृत्व से यह उम्मीद लगाना उनुचित नहीं है।

 

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