फादर पॉल डे ला गुरेवियेरे स्मृति व्याख्यान

बिहार और उड़ीसा से भी बदतर है, गुजरात: –हर्ष मंदर

66 वर्ष पहले भारत ने आधुनिक गणतन्त्र की नींव रखी। इतने सालो में हमने कितनी प्रगति की, इसका विश्वास इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहां हमारी आयु प्रत्याशा महज 37 वर्ष होती थी। वह आज बढ़ कर 67 वर्ष हो गयी हैं, लेकिन हम यह भी जान ले कि दुनिया में भूख से मरने वाला हर तीसरा बच्चा भारतीय ही होता है। गुजरात को जहां विकास के मॉडल के रूप में पेश किया जाता है, वहीं यह सच्चाई है कि वह भूख सूचकांक (हंगर इंडेक्स) के मामले में इसकी स्थिति बिहार और ओड़ीसा से भी बदतर है।  ये बात आज 29 जनवरी 2016 हर्ष मंदर को भारतीय सामाजिक संस्थान के खचाखच भरे हाल में फादर पॉल डे ला गुरेवियेरे स्मृति व्याख्यान में कही।

चर्चा को आगे बढाते हुए पूर्व आई. ए. एस. मंदर ने कहा कि यह शर्मनाक है की देश के होनहार युवा को दलित होने के कारण अपनी जान गवानी पड़ी. हम इतिहास में जाकर जहाँ देखते हैं कि बंगाल के अकाल मे जहां 30 लाख लोगों की जान गयी थी, वही आज  देश मे प्रतिवर्ष 20 लाख लोग बिना किसी जायज़ कारण के मौत के मुंह मे समाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में हम कितने बड़े दावे कर ले पर सच्चाई यह है कि केवल 7 % युवा ही कालेज तक पहुँच पाते है और इनमें अगर दलितो की बात की जाये तो इनकी उपस्थिति महज 4 % ही है। और बात रही न्याय की तो हम याक़ूब मेनन को जिस तरह से फांसी दी गयी उसमें कोर्ट, सरकार सबने पहले ही तय कर रखा था कि पेरोल पर कुछ दिनो के लिए छोड़ना तो दूर बल्कि उसकी फांसी के लिए उसके जन्मदिन की तारीख ही उसने पहले से तय कर रखी थी।

गुजरात मे किस तरह मासूमों को हिंदुवाद के नाम पर कत्ल किया गया यह बात किसी से छिपी नहीं है। लेकिन बात यह अन्याय सिर्फ सांप्रदायिक दंगो के समय ही नहीं बल्कि हर रोज होता है लेकिन हमे इस कदर इससे अनजान बनाया गया है कि हमें इस बात तक अंदाज़ा तक नहीं होता। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हर्ष मंदार ने कहा कि जब उन्होंने कुछ लोगों के साथ मिलकर  एक बार दिल्ली मे महिलाओं के लिए रैन बसेरे के निर्माण कराया था उस वक्त उन्होंने वहाँ पहले दिन रात गुजारने वाली एक महिला से उसका एहसास जानना चाहा। लेकिन उन्होंने बताया कि उस महिला का जवाब ऐसा था कि जिसे कोई सोच भी नहीं सकता। उस महिला ने कहा कि 17 सालों मे मेरी यह पहली रात होगी जब मेरे साथ कोई बलात्कार नहीं कर सकेगा। और बात करें जेलों की तो इसमे क्या कोई शक है कि इनमें कैद अधिकांश दलित, आदिसवासियों और मुस्लिमों को ही होती है। और यदि फांसी की सजा पाये लोगो की सामाजिक पृष्ठभूमि देखे तो वहाँ भी एकाध अपवाद छोडकर सभी लोग इन्हीं तीन वर्गो के होंगे।

दरअसल देश मे कमजोर तबकों के खिलाफ इतने अपराध सिर्फ इसलिए हो रहे हैं क्योंकि अपराधी को यह साफ मालूम है कि वह चाहे जो करे वह साफ बच निकलेगा। डॉ अम्बेडकर ने संविधान निर्माण के समय ये साफ कहा था कि हम जहां राजनीतिक तौर पर समानता की ओर जा रहे हैं वही आर्थिक और सामाजिक रूप से हममें घोर विषमता है। दुखद बात है कि इतने सालों मे इस खाई को पाटने की बजाय देश ने इसे और भी गहरा कर दिया है। यह शर्मनाक बात है कि आज इस विषमता की जिम्मेदार नयी आर्थिक नीति की यदि कोई हल्की सी भी आलोचना करता है तो उसे सीधे देशद्रोही करार दिया जाता है। जबकि सच्चाई है कि सरकार की आलोचना करने वाले लोग वास्तव मे देश की जनता और संविधान से सच्चा प्यार करते हैं।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जयति घोष ने कहा कि दर असल जाति व्यवस्था हमें अन्याय को सहने और जायज़ मानने का आधार तय करती है।  अपने उद्बोधन मे उन्होने इस बात पर आशा भी जताई की तमाम खामियों के बावजूद देश मे लोकतन्त्र का कायम रहना आने वाले समय ने न्याय, समता और सच्ची आज़ादी के लिए एक उम्मीद की किरण है।

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