माता की धरती पर माताओं का अपमान

नारी समाज के प्रति बढती हिंसा और नकारात्मक सोच के लिए ज़िम्मेदार कौन ?

[ अब्दुल मोइद अज़हरी ]

आज हमारा देश हताशा और निराशा के ऐसे दो राहे पर खड़ा है जिस के आगे खंदक है और पीछे खाई है। महंगाई की मार ने वैसे भी ग़रीबों के जीवन में ज़हर घोल दिया है। ऊपर से बढ़ती बेरोज़गारी एक आम आदमी के जीवन को पानी से भी सस्ता करने पर तुली हुई है। ऐसे में किसानों की आत्महत्याएं अब लोगों के लिए आम बात लगने लगी है। समाज का हर वर्ग ठगा सा लग रहा है। उसे लगता है कि रक्षक ही भक्षक बन जाएँ तो फरियाद किस से की जाये। हिंदुस्तानी समाज की मौजूदा स्थिति यही है कि “ एक दो ज़ख्म नहीं जिस्म है सारा छलनी! दर्द बेचारा परेशां है कहाँ से उठे!! कुछ दिनों पहले बुलंद शहर की हाई वे 91 पर माँ बेटी के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना ने शर्मिंदगी और बेबसी की सारी हदों को तोड़ दी। बाप बेटे को बांध कर सामूहिक बलात्कार और उस के बाद लूटपात उन मुजरिमों की हिम्मत और निडरता को ऐसे दर्शाती है मानों उन्हें लगता है कि इस देश में मुजरिमों के साथ कुछ होने वाला नहीं है। सामूहिक बलात्कार, हत्या और लूट पात का यह हादसा पहला और नया नहीं है। इस से पहले भी दिल दहलाने वाले हादसे हो चुके हैं। भारत के इतिहास में होने वाले कुछ यादगार धरनों में से एक धरना राजधानी दिल्ली में निर्भय हत्या और बलात्कार मामले में हुआ था। उस के बाद बहुत कुछ हुआ। लेकिन सोच और व्यवस्था नहीं बदली। औरत कल भी बे बस थी और आज तक बे बस है। एक वक़्त था जब सती प्रथा की परंपरा में औरतों का शोषण होता था। उसे बंद किया गया। कन्या भ्रूण हत्या की नैतिक परम्परा शुरू की गयी। उस में बदलाव आया तो दहेज़ हत्या और बलात्कार के रास्ते खुलते चले गए। परम्पराएँ बदलीं। न सोच बदली और न ही व्यवस्था। औरत के एक रूप को पूजने के बाद उसी रूप का बलात्कार एक ऐसी मानसिकता है जो सब कुछ ख़त्म कर देती है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ो जैस सैकड़ो स्कीमें भारत की बेटियों को बचाने में नाकाम हैं। बेटियों के साथ ऐसी बर्बरता और दुर्व्यवहार करने वाले कैसे भूल जाते हैं जब खुद उनके घर में बहु और बेटी होती है। बहु बेटियों के साथ ऐसा सुलूक करने वाले सुन्दर बहु का सपना कैसे देख सकते हैं। आंकड़े के मुताबिक १०% केस ही पुलिस और अदालतों तक पहुच पाते हैं उस के बावजूद सिर्फ 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 33700 बलात्कार के केस दर्ज किये गए। प्रत्येक दिन लगभग 93 बलात्कार की घटनाएँ होती है। हर आधे गहनते में भारत की बेटी का बलत्कार होता है। 2014 में मध्य प्रदेश में रोज़ाना 13 केस बलात्कार के दर्ज किये गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2013 में 4335 रेप केस मध्य प्रदेश में दर्ज किया गए। जो उस वर्ष का सब से बड़ा रिकॉर्ड था। 3063 महाराष्ट्र और 3285 राजस्थान के बाद 3050 उत्तर प्रदेश चौथे नंबर पर था। अपहरण के 9,737 और दहेज़ हत्या के 2,335 केसों के साथ उत्तर प्रदेश अपराध के शीर्ष पर था। मई 2014 में बदायूं जिला के कतरा गावं में दो लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उनकी हत्या के हादसे ने दिल दहला दिया था। बलात्कार की संख्या और उनका प्रतिशत प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। हर सांप्रदायिक दंगों में दंगाइयों को बहु बेटिओं की इज्ज़त इनाम में दे दी जाती है। 1947 की जंगे आज़ादी के बाद बटवारे के समय कई हज़ार बेटिओं को हवास का निशाना बनाया गया। 2002 को भारत की बेटिओं के आंसुओं ने भारत माता के दिल को चीर कर रख दिया। मुज़फ्फर नगर के दंगों में भी यही बेटियां जलीं तपी और तारतार हुयीं। यह कौन सी मर्दान्गी है जो हमेशा औरतों पर दिखाई जाती है। राजनैतिक समर्थन और विरोध की में भड़के सांप्रदायिक दंगों की आग में बेक़सूर औरतें जलती हैं।

यह वो आंकडे हैं जिन की शिकायत दर्ज की गयी है। आधे से ज्यादा तो थाने तक पहुँच ही नहीं पाते। उस के बाद आधे ऐसे होते हैं जिन की शिकायत ही दर्ज नहीं हो पाती है। जिन की फरियाद थाने तक पहुँचती है उन में से आधे ही अदालत तक पहुँचते हैं। एक दुखद वास्तविकता से पूरा भारत इंकार नहीं कर सकता कि कितने लोगों को सज़ा होती है या अब तक हुई है।

बलात्कार के मामले में एक रिपोर्ट यह भी है कि बलात्कार और छेड़खानी से पीड़ित महिलाओं में से ज़्यादा संख्या गरीब और दलित महिलाओं की है। उस से भी ज्यादा दुखद यह है कि 90% से ज्यादा बलात्कारी पीड़ित के जानने वाले होते हैं।बलात्कार से पीड़ित एक साल की बच्ची से लेकर 70 वर्ष की व्रधा तक होती है। शहर से लेकर गावं तक हर जगह यह विष फैला हुआ है जो भारतीय समाज के दामन को रोज़ दागदार करता है। महिला शशक्तिकरण, महिला विकाश और महिला अधिकार की सैकड़ों योजनाओं और उन पर गर्म राजनीति के बावजूद इस महिला समाज का उद्धार संभव होता नज़र नहीं आ रहा है। इस महिला वर्ग का शोषण हर वर्ग ने किया है। राजनैतिक, व्यवसायिक यहाँ तक की धार्मिक दुकानों पर भी इस महिला की इज्ज़त को बेंचा गया। हर रिश्ता शर्मसार हुआ है। माँ बेटे, बाप बेटी और भाई बहन के पाक रिश्तों को भी सरे बाज़ार तारतार किया गया। किस से फरियाद की जाये और किस की शिकायत की जाये।

आँखों पर मजबूरी और बे बसी की पट्टी बांधकर हमारी सरकारें बूढी माओं, जवान बहु बेटिओं और मासूम बच्चियों को सिसकती और बिलकती आहें न सुन सकीं। महिला अधिकार पर भाषण देने वालों की भी ऑंखें 2,3 और 5 साल की मासूम बच्चियों तक नहीं पहुँचीं और न ही उन्हें 50,60 और 70 साल की माओं के हवा में उड़ते आंचल नज़र आये। आखिर भारत की यह बहु बेटियां कब तक अपनी जान माल और इज्ज़त आबरू को लुटाती रहेंगी? और सरकारी बेबसी और मजबूरी की बदौलत सीना चौड़ा कर के ये भेडिये और दरिन्दे कब तक भारत माता के आंचल पर हाथ डालते रहेंगे? इन के अच्छे दिन कब आएंगे और सब के साथ इन का विकास कब होगा? 56 इंच के चौड़े सीने तक क्या इन की फरियाद पहुँच पायेगी? पूरा सरकारी तंत्र और कानून व्यवस्था महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने और न्याय दिलाने में विफल नज़र आता है। ऐसा लगता है की यह पूरा तंत्र और व्यवस्था माफियाओं के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है।

सरकार के साथ इस समाज को क्या कहा जाये। आखिर यह जुर्म पलता तो इसी समाज में है। यह एक मानसिक बीमारी है। समाज के पास इस का इलाज रहा है। इतनी बेबसी और मजबूरी पहले नहीं थी।

इस पुरुष प्रधान समाज में औरतों की स्थिति जानवरों की भांति हो गयी है। महिलाओं को अपने अधीन रखने की सोच और मानसिकता औरतों के विरुद्ध बढ़ते अपराध का मुख्य कारण हैं। भारतीय संस्कृति जहाँ एक तरफ माँ के अलग अलग रूप की पूजा और अर्चना करती है। लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा समेत कई देवियाँ हैं जिन्हें पूजा जाता है। गाय के साथ इस धरती को भी माता कह कर सम्मान दिया जाता है। बड़े गर्व से भारतीय अपनी मात्र भूमि को भारत माता कह कर गौरव महसूस करता है। वहीँ दूसरी तरफ माताओं का चीर हरण भी होता है। दूसरों के आँचल में हाथ डाल कर अपनी सीता को अग्नि परीक्षा के लिए मजबूर किया जाता है। इस दोगले चरित्र ने माता शब्द को भी अपमानित कर दिया है।

सरकारी तंत्र की विफलता के साथ सामाजिक प्रकिर्या भी असहाय नज़र आ रही है। हमारा समाज भी इस अपराध को झेलने लगा है। उसकी ख़ामोशी समर्थन का कम कर रही है। हर दर्द का इलाज समाज के पास होता है। पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की हर आस टूट जाती है। हर लम्हा और हर वक़्त उन्हें एक लड़ाई लड़नी पड़ती है। लेकिन समाज की सकारात्मक सोच उसे लड़ने का सहस देती है। जीने की उम्मीद देती है। जब समाज उसे अपनाता है तो उस के अन्दर जीने का सहस पैदा होता है। अपराध और अपराधी से लड़ने के लिए अपने आप को तैयार कर लेती है। लेकिन जब यही समाज अपनी नकारात्मक सोच की वजह से उसको अपनाने से इंकार कर देता है तो बार बार उस दर्द को महसूस करती है। एक बार तो उस के साथ हादसा हुआ है। लेकिन समाज का यह रवैया उसे हर रोज़ मारता है और सज़ा देता है। पीड़ित होने की सज़ा देता है। लेकिन यही समाज उस अपराधी के साथ क्या करता है? उस अपराधी को हर हल में अपनाता है।

अगर समाज का यह रवैया ना बदला तो सरकारी तंत्र और न्याय व्यवस्था के सुधरने के बावजूद औरतों का शोषण होता रहेगा। औरतों के विरुद्ध हो रहे अपराध के खिलाफ समाज को कड़े फैसले लेने होंगे। अपराधी का समाजी बहिष्कार आवश्यक है। हर तरह का बायकाट हो। पीड़ित का साथ भी दिया जाये। उसे अपराधी की नज़र से ना देखा जाये।

औरतों प्रति बढ़ते इस शोषण के पीछे खुद महिलाओं का भी हाथ होता है। देह व्यापार से लेकर बलत्कार की कई घटनाओं ने इस बात की पुष्टि की है। अभी हाल ही में आगरा की एक मार्किट में अश्लील वीडियो की सीडियों का बड़ा खुलासा हुआ है। 50रु से लेकर 150रु तक की सीडी मार्किट में उपलब्ध थी। यह ऍम ऍम एस की विडिओ मोबाइल से बनायीं गयी थी। यह घटना सरकार की नियत के साथ समाज की मानसिक बीमारी को प्रकाशित करती है। हमारी सरकार इस मार्किट को सीज़ कर एक उन विडिओ के आधार पर मुजरिमों को पकड़ने में दिलचस्पी क्यूँ नहीं दिखा रही है, यह एक बड़ा सवाल है। उस के साथ ही यह विडिओ बनाए वाले लोगों की मानसिकता भी एक सवाल खड़ा करती है की आखिर हम कहाँ खड़े है। हम खुद अपने आप पर ज़ुल्म कर रहे हैं। आधुनिक तकनीक तरक्की के लिए था इसे तो हम ने जुर्म के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। ज़रूरत से ज़्यादा आसानी मुश्किलें कड़ी कर देती है। यह तकनीक ऐसे लोगों के हाथों में चली गयी है जो इस के लिए तैयार नहीं थे।

रक्षा बंधन के दिन जब भाई अपनी बहन को कुछ मांगने के लिए कहे तो हर बहन यह वचन मांगे कि जितना ख़याल तुम हमारा रखते हो और जिस नज़र से हमें देखते हो उसी नज़र से हर लड़की को देखना। हर माँ अपने बेटे से यही मांगे कि मेरा आदर और मेरा सम्मान हर औरत के सम्मान में है। औरत के विरुद्ध बढ़ते अपराध के खिलाफ अब खुद औरतों को खड़ा होना होगा। बेटे, पति और भाई की मोह माया में आकर जुर्म को बर्दाश्त करने की बजाये उस का विरोध करें।

कोई भी समाज बिना माँ के अधुरा है। उन्हें अपनी इस महत्वता को समझना होगा और समाज में अपनी हैसियत बताने के साथ मनवानी होगी। घर हर व्यक्ति की ज़रूरत है। अपराध का विरोध जब घर से होने लगेगा तो उसे कहीं भी जगह नहीं मिलेगी।

Abdul Moid Azhari (Amethi) Email: abdulmoid07@gmail.com

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