मिलिए इस मुस्लिम युवा से गाँव-गाँव जाकर शिक्षा अभियान चलाता है

फेसबुक पर कुछ बेहद क्रांतिकारी लेखक मौजूद है जिन्हें पढ़कर कभी कभी ऐसा लगता है की बस कुछ ही देर में ऐतिहासिक क्रान्ति शुरू होने जा रही है लेकिन लॉगआउट करने के बाद सब आया राम गया राम हो जाता है. आज हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलवा रहे है जो ना सिर्फ शिक्षा की बात करते है बल्कि धरातल पर जाकर इसके लिए काम भी करते है.

दिल्ली जामिया मिल्लिया इस्लामिया से अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने वाले तारिक अनवर तालीमी बेदारी मुहीम चलाते है जिसके तहत वो गाँव तथा उन जगहों पर जाते है जहाँ शिक्षा ना के बराबर है तथा बच्चे को कुछ बड़ा होते ही चाय की दूकान, पंचर लगाने, या किसी अन्य काम पर लगा दिया जाता है. आइये पढ़ते है हम तारिक की ज़ुबानी

“हम फेसबुकीया क्रांतिकारियों की अपने क़ौम से हमेशा एक शिकायत होती है कि हमारी क़ौम मौलवियों को छोड़ किसी दूसरे की बात नहीं मानती है. मैं इस तर्क से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. मैं छुट्टियों में जब भी घर जाता हूँ अपने इलाके की गाँव में जाकर “तालीमी बेदारी मुहीम” चलाता हूँ.

इलाके के कुछ छात्रों को इकठ्ठा करता हूँ और प्रत्येक गांव में रात को चार घंटा बिताता हूँ. यह मुहीम बहुत सस्ता है जिसमे एक माइक बोलने के लिए और शॉर्ट फिल्म दिखाने के लिए एक प्रोजेक्टर की आवश्यकता पड़ती है. शॉर्ट फिल्म ऐसी होती है जिसमे ठेला वाला, रिक्सा वाला, ताड़ी बेचने वाला और फल बेचने वाला का बेटा आईएएस और IIT करता है उसपर आधारित होती हैं.

गाँव पहुँचने से पूर्व गाँव की डेमोग्राफिक रिसर्च कर लेता हूँ. प्रत्येक फिल्म की समाप्ति पर उस फ़िल्म को गाँव की डेमोग्राफिक डाटा से तुलना कर कम-कम दस मिनट का भाषण देता हूँ. लोग बहुत शौक से बातों को सुनते है जिसमे महिलाओं की संख्या अधिक होती है. बीच-बीच में लोग प्रश्न भी करते है.

काफी परिवारों ने तारिक अनवर की इस मुहीम के बाद बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया है

मैं यहाँ कोई तारीफ़ नहीं कर रहा हूँ. मेरे इलाके की एक बड़ी आबादी मुम्बई के धारावी में रहती है. अल्लाह की मसलेहत है कि जिस गाँव से मुहीम गुज़रता है जब बाद में फ़ीडबैक के लिए जाता हूँ तो मालूम पड़ता है कि अनेकों माता-पिता ने अपने बच्चों को मुंबई जाने से रोक लिया है और स्कूल भेजना शुरू कर दिया हैं. यह मुहीम विगत दो वर्षों से प्रत्येक 6 महीने पर चलाता हूँ. न किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था से फंडिंग बल्कि युवाओं का आपसी योगदान होता है. इसलिए मुझे अपनी क़ौम की लोगों से बिलकुल शिक़ायत नहीं है कि वह मौलवी हज़रात को छोड़ दूसरों की बात नहीं मानते है. मेरा मानना है कि हमने अबतक जड़ में पहुँचने की कोशिश ही नहीं किया है सिर्फ हवा-हवाई चर्चा कर रहे है. समय है जड़ में पहुँचने का…”

Extracted from kohraam

Check Also

Noted Muslim personalities who played important positive roles in Sikh history

WordForPeace.com By Iqbal R. Sama   Sikh Mazhab Se Mutalliq Motabar Muslim Shaksiyat (Urdu) (“Respected …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *