मेरा नजीब मुझे वापस दे दो!

अब्दुल मोईद अज़हरी

भारत की पहचान भारत का संविधान और उस संबिधान के प्रति तमाम भारतीय का विश्वास है। पूर्ण विश्व में बहुसंख्यक देश होने के बावजूद आपसी सदभाव प्रेरणा दायक है। यह अकेला देश है बहुधार्मिक होने के साथ साथ विभिन्न संस्कृति और परम्पराओं कास्थान है। इस देश की अन्य विशेषताओं में से एक धार्मिक और वक्तिगत आज़ादी है। यही वजह है कि एक साथ मंदिर और शिवालों से घंटियों और आरतियों की मधुर आराधनायें सुनाई देती हैं और मस्जिद व दरगाह से अज़ान व ज़िक्र की सदायें बुलंद होती है। गुरूद्वारे में कीर्तन के साथ ईसा मसीह के चर्च में प्रेयर होता है।यही इस देश का सौंदर्य, स्वाभिमान, गर्व और गरिमा है।

यहहमारा दुर्भाग्य है किहमइस देश की एकता और अखंडता को अपनी आँखों से टूटता हुआ देख रहे हैं।इस देश को यह दशा और दिशा देने वालों ने अपने प्राणों की आहुति दी।जन,जान, माल और मर्यादा का बलिदान दिया। सुख, सुकून, मोह और माया को त्याग दिया ताकि ऐसे देश के सपने को साकार कर सकें जिस में सिक्षा, सुरक्षा, श्रधाऔर समानता की नदियाँ तमाम हिंदुस्तानिओं पर अपनी प्रेम और कोमलता को न्योछावर करें।आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक, धार्मिक और राजनैतिक स्तर में ईमानदारी की बढ़ोतरी हो। किसी भी भारतीय को उस की जाति, धर्म या समुदाय के नाम पर आहत न किया जाये। धनवान गरीबों के साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार न कर सकें।

अनेकता में एकता के लिए उदाहरण दिए जाने वाले देश में जिस तरह से सामाजिक, न्यायिक, धार्मिक और राजनैतिक स्तर गिरा है वो निंदनीय और गहन विचार का विषय है। न्यायिक स्तर में आयी भारी गिरावट ने देश के उन वीरों की आत्माओं को नस्तर लगाने का काम किया है जिन्हों ने देश की खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। न्याय भी अब वयक्ति देख कर मिलने लगा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि न्याय को खरीदने की परंपरागत शुरुआत हो गई है। ऐसे में व्यक्ति विशेष और खास समुदाय और समूहों की जेब में या कुर्सियों में दब कर रह गया है। ऐसे में सामाजिक मूल्यों के ऊपर कर्तव्य का भार आ जाता है लेकिन राजनीति छल और कुनितिओं के चलते उस में संदेह और दुर्व्यवहार की भावनाएं उत्पन्न होने लगीं। धार्मिक गुरुओं ने भी अपनी गुणवत्ता को अपने अपने धर्माश्रमों, पूजा स्थानों और इबादत गाहों तक सिमित कर लिया।

आज सब से बड़ा सवाल और सुरक्षा का है। इस लोकतंत्र देश का हर नागरिक अपने देश के मुखिया से कम से कम इतनी तो आशा रख सकता है कि इस देश कोविश्वमें शिखर पर पहुँचाने के लिए सामूहिक प्रयास करे जिस के लिए सिक्षा और हुनर के अवसर मिलते रहेंगे। दूसरी सब से बड़ी आशा रोटीकपड़ा और मकान के बाद यह होती है कि हर नागरिक की सुरक्षा को विश्वसनीय बनाया जाये।

पिछले दो वर्षों में विशेष कर और इक्कीसवीं शताब्दी में आम तौर पर इन तमाम मूल्यों का न सिर्फ हनन हो रहा है बल्कि ख़ुदउनके साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार हो रहा है। तो देश का हल क्या होगा यह कहना कठिन है। देशका मन जाना विश्व विद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय ने अपने इतिहास के पुराने पन्नों में ऐसे दिन नहीं देखे होंगे जैसे हालत उस ने 2016 में देखे हैं। हैदराबाद बाद के एक विश्व विद्यालय के एक होनहार छात्र रोहित वेमुला के साथ जो हुआ इतिहास के पन्नों में लाल सियाही से लिखा जायेगा। यह एक रोहित का मर्डर नहीं था बल्कि शिक्षा का गला घोंटा गया था। या फिर यह एक संकेत था कि अगर किसी ने भी देश के संविधान के प्रति विश्वास दिखाकर वर्तमान भ्रष्ट राजनीती के विरुद्ध जाने की कोशिश करेगा उसे रोहित वेमुला बना दिया जायेगा। यह देश के नागरिक के साथ नहीं बल्कि देश के साथ मज़ाक किया गया था।

दिन को 12:00 बजे विश्व विद्यालय के छात्रावास से एक विद्यार्थी को किडनैप कर लिया जाता है और शासन एवं प्रशासन दोनों ही अपनी अपनी कुर्सिओं पर बैठ कर दुसरे नजीब की तयारी कर रहे हैं। यह दोनों ही हादसे सिर्फ और सिर्फ उदाहरण के लिए हैं कि कोई भी भ्रष्ट नीतियों के विरुद्ध जाने की कोशिश न करे। ऐसे सैकड़ों हादसे रोज़ हो रहे हैं लेकिन उस पर कोई भी कान धरने को तैयार नहीं। एक माँ अपने बच्चे की तलाश में महीनों छात्रावास का चक्कर लगाती है लेकिन उसे जवाब आंसू, धक्के, गलियां और दरबारों के चक्कर के सिवा कुछ न मिला।पूरा छात्रावास भय और निराशा के अँधेरे में डूब गया लेकिन देश धुरंधर अपने महलों की चकाचौंध से नीचे आने को तैयार नहीं। देश के मौलिक अधिकारों का चीर हरण होता रहे अपना सिक्का भ्रष्टाचार के बाज़ार में चलता और छनकता रहे।

जे.एन.यू. के छात्रों को लगा कि अगर हम देश के संविधान के लिए खड़े न हो सके और न्यायके लिए आवाज़ न उठा सके तो फिर शिक्षा का क्या फायदा। विद्यार्थिओं को सब से पहले देश और देश के संविधान की शिक्षा दी जाती है। उस प्रति समर्पित रहना और और उसकी सुरक्षा को विश्वसनीय बनाना गुरुदाक्षिना में शामिल है। ऐसे में हर विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वहअन्याय के विरुद्ध शशक्त आवाज़ उठाये और शिक्षा के प्रति हो रहे निरंतर अत्याचार को रोके। छात्रों का अपने अधिकारों के लिए धरना देना अपने आप में ही चर्चा का विषय है कि ऐसी स्थिति क्यूँ आई कि विद्यार्थिओं को धरना देने की ज़रूरत पड़ गयी। वर्तमान स्थिति यह है किबिना धरना दिया और चीखे चिल्लाये और लाठी डंडा खाए न्याय मिलना मुश्किल ही नहीं न मुमकिन होता जा रहा है। जब छात्र भूक हड़ताल पर बैठने को मजबूर हो जाएँ तो मौक़ा की नजाकत का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं। पिछले कई दिनों से जे.एन.यू. संगठन के साथ छात्र भूक हड़ताल कर रहे हैं.

उन में से शायद किसी का भी नजीब से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं होगा। अलग प्रदेश के भी लोग हैं। लेकिन फिर भी वह खाना पानी त्याग दे कर मुखिययों को अपनी ओर आकर्षित कर के न्याय मांग रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि यह भूक हड़ताल एक आन्दोलन बन जाये और फिर एक ऐसी लहर उठे जो अपनी गति हर धुरंधरों को बहा ले जाये।

सवाल देश की जनता से है। सभी छात्रों से है। शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े सभी महानुभाओं से है। एक आम आदमी से लेकर देश के मुखिया से है। महीनों से रो रही माँ का सवाल देश के हर नागरिक को रोटी कपड़ाऔर मकान के साथ रक्षा और सुरक्षा देने वाले ज़िम्मेदार से है। नजीब कहाँ है ?

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