रक्षा बंधन का उपहार: ‘हर बहन की सुरक्षा’

[ अब्दुल मोइद अज़हरी ]

ईश्वर ने जब इस स्रष्टि की रचना की तो इस में बसने वाले प्राणी यानि मनुष्यों को अलग अलग जान जातियों में बनाया। फिर उन से मानव जाति विकास होता रहा। उसे विभिन्न क़बीलो और गिरोहों में भी बाँट दिया ताकि एक दूसरे को पहचान सकें। मानव जाति को रिश्तों और कर्तव्यों की डोरी से बांध दिया। मिटटी से बने मनुष्य की फ़ितरत में गलतियाँ और त्रुटियाँ हैं। इसी लिए कई तरह के रिश्तों से जोड़ दिया। एक दूसरे का ख़याल मान सम्मान और अपने कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य कर दिया। धर्म ने इस का रास्ता दिखाया। एक समाज की स्थापना हुई। समाज में कुछ ऐसे रीति रिवाज और परम्पराओं को शुरू किया गया जो समय समय पर मनुष्य को उस के कर्तव्य याद दिलाते रहें। मानव जाति को उस के जीवन उद्देश्य से भटकने न दे। उन्ही परम्पराओं में से एक रिवाज रक्षा बंधन का है।

रक्षा बंधन भारतीय संस्कृति का एक बहुमूल्य पर्व है जिसे बड़ा ध्यान पूर्वक माना और मनाया जाता है। इस त्यौहार को एक बहन अपने भाई के हाथों में राखी बांधती है। उसे मिठाई खिलाती है बदले में भाई उसे एक उपहार देता है। इस तरह यह पर्व मनाया जाता है। यूँ तो देखने में यह त्यौहार अत्यंत सरल दिखता है। परन्तु इस की गहराई सामाजिक मूल्यों, मानवता और मनुष्यता के गहरे समंदर को जा छूती है। जिस तरह हमारा समाज ऊँच नीच, अमीर गरीब, सादगी और चका चौंध में बटा हुआ है। उसी तरह इस पर्व को मनाने के तरीके भी अलग और जुदा हैं। एक मामूली से धागे को बांध कर भी यह त्यौहार मनाया जाता है। और महंगे से महंगे यहाँ तक कि सोने के धागे से भी राखी बाँधी जाती है। बहन के सर पर श्रधा और उदार मन से हाथ रख देना भी उपहार होता है। और सोने चांदी एवं हीरे जवाहरात की सप्रेम भेंट भी तोहफे में दी जाती है। नेता, अभिनेता, साधू, संत, फकीर सभी इस इस बंधन में आस्था रखते हैं। निभाते कितने हैं यह एक अलग प्रश्न है

रक्षा बंधन को बहनों का त्यौहार कहा जाता है। इस में दो शब्द हैं ‘रक्षा’ और ‘बंधन’। यह दोनों शब्द इस त्यौहार की परिभाषा बताते हैं। एक बहन अपने भाई के हाथ में धागा बांध कर उसकी आरती उतारती है। ईश्वर से प्रार्थना करती है कि उसके भाई की हर मुसीबत में रक्षा हो। उस के बाद भाई अपने बहन की रक्षा और सुरक्षा की सौगंध लेता है। जब बहन के सर पर हाथ रखता है तो इस इरादे से रखता है कि हर हाल में बहन की रक्षा करेगा। उसे कभी दुखी नहीं होने देगा। उस की आँखों से आंसू नहीं बहेंगे। वैसे भी समाज में भाई बहन का रिश्ता माँ के बाद सब से अहम् माना जाता है। समयानुसार समाज के बदलते रवैये ने हमेशा महिलाओं का शोषण किया है। रास्ते और तरीके बदलते चले गए। आज तक वही हो रहा है। एक औरत की लड़ाई माँ के पेट से शुरू होती है। फ़िर जीवन भर उस का युद्ध चलता रहता है। अगर किसी की ज़िद या जागरूकता के कारण बेटी ने जनम ले लिया तो उस की सिक्षा के लिए फिर से संघर्ष होता है। शादी के बाद ससुराल में वो संघर्ष चलता रहता है। एक लड़की की शादी के बाद या शादी के समय उसी घर का लड़का ज़िम्मेदार हो जाता है। यह बंधन उस नाज़ुक रिश्ते को भी मज़बूत करता है कि शादी के बाद लड़की बिलकुल पराई नहीं हो गयी है। उसका रिश्ता अभी भी बाकी है।

इस त्यौहार में भाई अपनी बहन की इच्छा पूरी करने की कोशिश करता है। भाई अपनी बहन को मन चाहा उपहार भी देने की कोशिश करता है। यह त्यौहार महिलाओं के प्रति पुरुष प्रधान की सोच बदल सकता है। इस के ज़रिये  महिलाओं के प्रति बढ़ते शोषण को भी रोका जा सकता है। यह संभव है। जब भाई अपनी बहन के सर पर हाथ रखे तो हर बहन उपहार में एक ही चीज़ की मांग करे। ‘समाज की हर बहन की रक्षा’। हर बहन अपने भाइयों से यह वचन और सौगंध ले कि अगर मेरी रक्षा और सुरक्षा चाहते हो तो हर लड़की में मुझे देख लिया करो। किसी भी लड़की की तरफ गलत निगाह उठाने से पहले एक बार सोच लेना की तुम्हारी भी एक बहन है। जिस पर गलत निगाह डाल रहे हो उस का भी कोई भाई होगा। एक बार यह ज़रूर सोच लेना कि अगर यही गलत निगाह मेरी तरफ कोई उठाये तो तुम्हे कैसा लगेगा। मेरी रक्षा और सुरक्षा दूसरों की बहन बेटियों के साथ किये गए अछे व्यवहार में है। भाई की तरफ से बहन को यह तोहफा एक नए समाज को जनम देगा।

बाद नज़र उठने ही वाली थी किसी की जानिब ! अपनी बेटी का ख़याल आया तो दिल कांप गया !!

यह एक सच्चाई है कि महिलाएं खुद अपनी शक्ति और अधिकार से वंचित इस लिए हैं क्यूंकि उन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान ही नहीं है और न ही वो उसे प्रयोग कर पा रही हैं। बिना महिला के यह दुनिया अधूरी है। यह समाज और समाज के बनाये नियम कानून सब व्यर्थ है। यह एक ऐसी वास्तविकता है जिस से कोई भी इंकार नहीं कर सकता। उस के बावजूद मह्लिलाओं के प्रति बढ़ता शोषण और उत्पीड़न निंदनीय और अफसोसनाक है। महिलाओं को सब से पहले खुद अपनी पहचान करनी होगी। एक महिला को दूसरी महिला के लिए लड़ना और खड़ा होना होगा। माँ, बीवी, बहन और बेटी सब को इस के लिए न सिर्फ जागरूक होगा होगा बल्कि वचन बद्ध हो कर लड़ना होगा। जब तक एक महिला खुद दूसरी महिला के समर्थन में सामने नहीं आयेगी महिलाओं का बहिष्कार और उन के प्रति अन्याय बढ़ता ही रहेगा।

रक्षा बंधन सिर्फ एक धागा बांध कर मिठाई खिला देने या महंगे उपहार देने का नाम नहीं है। यह महिलाओं के प्रति सम्मान का पर्व है। महिलाएं समाज की मान मर्यादा इज्ज़त और सम्मान है। उन के साथ दुर्व्यवहार समाज की इज्ज़त पर हमला है। यह त्यौहार हमें उसी वचन की तरफ ले जाता है। हर साल हमारा ध्यान हमारे उस कर्तव्य की ओर आकर्षित करता है। महिलाओं का सम्मान उन पर अहसान नहीं उन का हक़ है और हमारा कर्तव्य है। अगर हम एक तरफ अपनी बहन को उस की रक्षा और सुरक्षा का आश्वासन देते हैं और दूसरी ओर किसी दूसरी बहन की इज्जत हमारी हवास का शिकार बने तो ऐसे त्यौहार और उस में किये गए वादों का न कोई अर्थ है और न ही कोई मोल है। सब ढोंग है और दिखावा है। किसी के ज़ख्मों पर चाहत की पट्टी बांध देना इस नाटक से कहीं बढ़ कर है।

रक्षा बंधन जहाँ एक तरफ भाई बहन के रिश्ते में मिठास भरता है वहीँ दूसरी तरफ पुरुष और स्त्री के रिश्ते को सम्मान भी देता है। हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जिस में सरे रिश्ते अपनी महत्वता खो रहे हैं। बाप बेटी और माँ बेटे के रिश्तों को भी हवस की आग जला रही है। ऐसे में इस तरह की परम्पराओं का मोल बढ़ जाता है। इस त्यौहार को रीति रिवाज से ज़्यादा उसे अपने जीवन में बरतने की आवश्यकता है। भाई बहन का रिश्ता बड़ा नाज़ुक और पवित्र है। इस की पवित्रता की सुगंध को बचाए रखने के लिए ऐसे त्योहारों और परम्पराओं सामाजिक और नैतिक स्वीकृति देना ज़रूरी है। धर्म के साथ जुड़ी परम्पराएँ और रीति रिवाज समाज की भलाई के लिए होती हैं। हर संस्कृति में एक सीख होती है। एक मकसद और उद्देश्य होता है। उस मकसद को समझना आवश्यक है। बिना कारण और मूल्य समझे कोई भी रीति रिवाज परंपरा और धार्मिक प्रकिर्या व्यर्थ होती है। सब का मकसद मानव सेवा है। अगर हमारी पूजा, अर्चना, रीति रिवाज या किसी परंपरा से मानव हित नहीं हो रहा तो हमें समझ लेना चाहिए कि हम से कोई चूक हो रही है। हम ईश्वर की मंशा के विरुद्ध हैं। ईश्वर की मंशा के विरुद्ध किया गया कार्य कभी भी लाभदायक नहीं होता। हमें उस की कीमत चुकानी पड़ती है।

रक्षा बंधन जैसे पवित्र पर्व में हम रिश्तों की गरिमा को समझें। अपनी बहनों को ऐसा उपहार दें जिस से समाज की हर बहन आप पर गर्व करे। आप की बहन समाज में सर ऊँचा कर के चले। समाज का हर भाई आप की बहन को सम्मान देने में गर्व महसूस करे। सोचिये, खुद बदलिए। बदलाव अपने आप आयेगा। देर न करें। बहुत देर हो जाएगी।

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Abdul Moid Azhari (Amethi) contact: 9582859385 Email: abdulmoid07@gmail.com

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