विकास आदिवासी समाज के लिए एक धोखा है  –डॉ शिव विश्वनाथन

भारत के संविधान की चर्चा करते समय लोग आदिवासी नेता जयपाल सिंह के विचार और भूमिका को भूल जाते हैं। जयपाल सिंह संविधान सभा की बहस मे आदिवासी संस्कृति और सोच को रखने वाले एक नेता थे जो आदिवासी दृष्टिकोण से संविधान मे इस समुदाय के विचार और दर्शन को शामिल करवाना चाहते थे। पर बड़े दुख की बात है कि सरदार पटेल और पंडित नेहरू ने उनकी गंभीर बातों को भी तवज्जो नहीं दिया और उन्हे हंसी का विषय बना दिया। क्या आदिवासी देश के लिए समस्या है? या वे देश मे आ रही चुनौतियों और समस्याओं को हल करने का माद्दा रखते है? यह बात नई दिल्ली के भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान के खचाखच भरे हाल मे आज 3 फरवरी 2017 को भारतीय सामाजिक संस्थान में फादर पॉल डे ला गुरेवियेरे स्मृति व्याख्यान में डॉ शिव विश्वनाथन ने कही जो देश के माने हुए कोलमनिस्ट और जिंदल ग्लोबल स्कूल मे प्राध्यापक हैं।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए उन्होने कहा कि हमारे संविधान ने समता, स्वंतंत्रता और बंधुत्व की आदर्श बाते की, लेकिन इसकी भाषा शैली पश्चिमी और औपनिविशिक सोच से इतनी लबरेज थी कि वह भाषा की परिभाषा देते सामय केवल उन्ही भाषाओं को भाषा श्रेणी मे शामिल कर पाया जिनकी अपनी लिपि थी। इस नासमझी भरी परिभाषा के फलस्वरूप देश की ऐसी लाखों भाषाएँ जिनकी अपनी कोई लिपि नहीं थी एक झटकें मे नष्ट हो गयी। भाषा का नष्ट हो जाना सिर्फ एक भाषा को ही नहीं मारता बल्कि वह अपने साथ उसके समुदाय और संस्कृति की भी हत्या कर देता है। आदिवासी संस्कृति दरअसल यादों पर आधारित संस्कृति है जहां किताबी बाते नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पीढ़ी-दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है लेकिन दूसरी तरह जब से लिखित ज्ञान के सहेजने की कला विकसित हुई तब से रटने की प्रवृत्ति का विकास हुआ और रचनात्मकता का अंत हुआ।

देश मे एक समय चावल की एक लाख पचास हज़ार किस्में हुआ करती पर आज उनमें थोड़ी ही बची है। चावल की क़िस्मों का नष्ट होना महज खाद्य सामाग्री का नष्ट होना नहीं बल्कि यह अपनी मौत के साथ उन करोड़ो लोगो की पहचान और संस्कृति भी नष्ट कर डालती है जिनके जीवन का यह अभिन्न अंग है।

बड़े शर्म की बात है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बाधों को आधुनिक मंदिरों की संज्ञा दी पर इस विकास के नाम पर जिन लाखों आदिवासियो का आशियाना उजाड़ दिया गया उसका हिसाब कौन देगा। आज नर्मदा के सरदार सरोवर बांध और परमाणु बिजली घरों के नाम पर जब करोड़ो आदिवासियों को बेघर किया जा रहा है तो उसे हमारे अर्थशास्त्री नफा-नुकसान के अपने छद्म गणित के नाम पर जायज़ ठहराने से नहीं चुकते। दरअसल सारा दोष हमारे अर्थशास्त्र और विज्ञान का है जिसमें विविधता के लिए कोई जगह नहीं बल्कि वह अपनी औपनिवेशिक सोच हम पर थोपना चाहता है।

अगर हम अपने देश की समग्र उन्नति चाहते हैं तो हमे विकास का ढ़ोल पीटना बंद करवाना होगा। यह कैसा विकास है कि गुजरात से लाखों लोग जो दंगे के समय पर उजाड़ दिये गए थे आज तक अपनी जमीन पर वापिस नहीं लौट सके हैं।  अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होने कहा कि देश मे जब भी नीति निर्धारक कोई नयी योजना लेकर आते हैं उस योजना के क्रियान्वयन मे लाखो लोगो की जान चली जाती हैं।

समय है कि इन तमाम बुराइयों से लड़ने के लिए देश के संविधान मे परिवर्तन किया जाये। इसके नीति निर्देशक तत्व मे प्रकृति और आदिवासी सोच को शामिल किए जाने की जरूरत  है। यह बदलाव न सिर्फ आदिवासियों की ज़िंदगी और संस्कृति बचाएगी बल्कि देश मे लोकतन्त्र को भी बचाएगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता जे एन यू की प्रोफेसर सोना झरिया मिंज ने की एवं इसका संचालन सिस्टर ट्रीसा पॉल ने किया। कार्यक्रम मे संस्थान प्रमुख डॉ डेंजिल फर्नांडीस ने अतिथि का स्वागत स्मृति चिन्ह और स्टाल भेंट कर किया। धन्यवाद प्रस्ताव रत्नेश कातुलकर ने दिया।

गौरतलब है कि आई एस आई में वर्ष २०१२ से फादर पॉल डी स्मृति व्याख्यान का आयोजन  किया जा रहा है. फादर पॉल डे ला गुयेरेवियेरे (१९२०-२०११) फ्रांसीसी मूल के जेस्विट थे जिन्होंने अपना सारा जीवन देश के तमाम युवाओं और प्रबुद्ध जनों को समाज की कडवी सच्च्चाई से अवगत कराते हुए जागरूक करने में लगाया. अपने जीवन का आरम्भ उन्होंने मिल मजदूरी करते हुए तथा दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ़्रांसिसी सैनिक के रूप में किया. वर्ष १९४७ में वे अपने देश को छोड़कर भारत आये और यहाँ आकर उन्होंने समाज के वंचित तबको से जुड़े मुद्दों को खासकर इन्डियन सोशल इंस्टिट्यूट बेंगलोर और नयी दिल्ली के डोक्युमेंटेशन केंद्र में अपनी सेवा के दौरान अकादमिक विमर्शो में शामिल कराने का सफल प्रयास किया.

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