‘वेदांत का दिमाग और ‘इसलाम का शरीर’ ही देश के लिए एक उम्मीद: विवेकानंद और इसलाम

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By Ghulam Rasool Dehlvi
गुलाम रसूल देहलवी

स्वामी विवेकानंद धार्मिक पूर्वाग्रह के सख्त विरोधी थे. उनका मानना था कि ईश्वर तक पहुंचने के रास्ते तंग, अवरुद्ध, बंद या किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं. वे मानते थे कि सभी धर्म अपने अंतिम लक्ष्य में एक हैं. जैसे हिंदू दर्शन के अनुसार मोक्ष के माध्यम निर्वाण (दुख से मुक्ति या ब्रह्म से मिलाप) जीवन का वास्तविक और अंतिम लक्ष्य है, बिल्कुल उसी तरह इसलामी अध्यात्मिकता (सूफीवाद) के अनुसार मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता (विसाल-ए-इलाही) अल्लाह के साथ अंतरंग संबंध है.

दुर्भाग्य से, हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के कुछ धार्मिक कट्टरपंथी अपने गलत उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हिंदुस्तान के दो सबसे बड़े धर्मो के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को खराब कर रहे हैं. वे यह अफवाह भी फैला रहे हैं कि स्वामी विवेकानंद इसलाम के जबरदस्त विरोधी थे, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है.

मेरा मानना है कि स्वामी जी इसलाम के बुनियादी मूल्यों के बहुत बड़े प्रशंसक थे, जिनके बारे में उनका विश्वास था कि पूरी दुनिया में इसलाम के अस्तित्व का एकमात्र कारण उसके अंदर छुपे आध्यात्मिक नैतिक मूल्य हैं. उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था, ‘लोग पूछते हैं कि पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के धर्म में क्या गुण है? अगर उन के धर्म में कोई गुण या अच्छाई नहीं होती, तो यह धर्म आज तक कैसे जीवित रहता? केवल अच्छाई ही जीवित रहती है, अगर उनकी शिक्षाओं में कोई अच्छाई नहीं होती, तो इसलाम कैसे जीवित रहता? उनके धर्म में अच्छाई है.’

स्वामी विवेकानंद का उक्त बयान ‘स्वामी विवेकानंद की शिक्षा’ नामक किताब में ‘मुहम्मद और इसलाम’ अध्याय का एक अंश है. यह पुस्तक ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर एशरोवुड के 30 पृष्ठों के प्रकथन (परिचय) पर आधारित है. यह अध्याय अमेरिकी दर्शकों के सामने किये गये विवेकानंद के भाषण के चुनिंदा अंश का एक संग्रह है. पेश है संग्रह में दर्ज स्वामीजी के भाषण से कुछ अंश..

मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने जीवन के द्वारा इस बात का प्रदर्शन किया कि मुसलमानों के बीच सही संतुलन होना चाहिए. पीढ़ी, जाति, रंग या लिंग का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता. तुर्की का सुल्तान अफ्रीका के बाजार से एक हबशी खरीद सकता है और जंजीरों में उसे जकड़ कर तुर्की ला सकता है, लेकिन वह हबशी अपनी कम क्षमता के बिना भी सुल्तान की बेटी से भी शादी कर सकता है.

इसकी तुलना इस तथ्य के साथ करें कि हबशियों और अमेरिकी भारतीयों के साथ देश (संयुक्त राज्य अमेरिका) में कैसा व्यवहार किया जाता है. जैसे ही एक व्यक्ति मुसलमान हो जाता है, इसलाम के सभी अनुयायी किसी प्रकार का कोई भेदभाव किये  बिना उसे एक भाई के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, जो कि किसी अन्य धर्म में नहीं पाया जाता. अगर कोई अमेरिकी भारतीय मुसलमान बन जाता है तो, तुर्की के सुल्तान को उसके साथ खाना खाने में कोई आपत्ति नहीं होगी. अगर उसके पास बुद्धि है तो वह किसी तरह से वंचित नहीं होगा. इस देश में, मैंने अभी तक ऐसा कोई चर्च नहीं देखा जहां सफेद पुरुष और हबशी कंधे से कंधा मिला कर भगवान की पूजा के लिए झुक सकें.’

 ‘यह कहना उचित नहीं है जो हमें बराबर बताया जाता है कि, मुसलमान इस बात पर विश्वास नहीं करते कि महिलाओं के पास भी आत्मा होती है. मैं मुसलमान नहीं हूं, लेकिन मुझे इसलाम का अध्ययन करने के भरपूर अवसर मिले. मुझे कुरान में एक भी आयत (श्लोक) ऐसी नहीं मिली, जो यह कहती है कि महिलाओं के पास कोई आत्मा नहीं है, बल्कि वास्तव में कुरान यह सिद्ध करता है कि उनके पास आत्मा है.’

‘भारत का इसलाम किसी भी अन्य देश के इसलाम से पूरी तरह अलग है. कोई अशांति या फूट तभी होती है, जब अन्य देशों से मुसलमान आते हैं और हिंदुस्तान में अपने धर्मो पर उनके साथ न रहने का प्रचार करते हैं, जो उनके धर्म के नहीं हैं. व्यावहारिक अद्वितीय (वैदिक दर्शन की एक विचारधारा) को हिंदुओं के बीच वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना अभी बाकी है.”

“इसलिए हम इस बात के जबरदस्त समर्थक हैं कि वेदांत की विचारधारा चाहे अपने आप में जितनी सुंदर और शानदार हों, वह व्यावहारिक इसलाम की सहायता के बिना बेकार और बड़े पैमाने पर इनसानों के लिए निष्फल हैं. हमारे अपने देश के लिए दो महान विचारधाराओं की प्रणाली इसलाम और हिंदू धर्म का संगम ‘वेदांत का दिमाग और इसलाम का शरीर’ ही सिर्फ एक उम्मीद है. “

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