सुधारवादी सोच की जरूरत

By Bhupendra Singh

इस्लाम के नाम पर आतंकवाद के जिस नए रूप को दुनिया देख रही है वह मुस्लिम समाज और इस्लाम के प्रति एक राय का निर्माण भी कर रही है। ऑरलैंडो से लेकर ढाका तक, मदीने से लेकर बगदाद तक, इस्तांबुल से लेकर पेरिस तक घट रही हर आतंकी घटना की निंदा होनी चाहिए। मुसलमानों का एक धड़ा तो ऐसी घटनाओं के विरोध में बहुत मुखर है, लेकिन एक विचारधारा विशेष के लोग उसके समर्थन में हैं या फिर मौन हैं। आज पश्चिम एशिया में तबाही का पर्याय बना इस्लामिक स्टेट हो या फिर भारत के लिए खतरा बने लश्कर, जैश या जमात उद दावा जैसे संगठन, इन सबके बारे में उस मजहबी दलील को समझने की जरूरत है जो हिंसा को उचित ठहराती है? इस्लाम के नाम पर फैलाई जाने वाली आतंकी विचारधारा सभी मुसलमानों को प्रभावित करती है और उन्हें अपनी पड़ोसी कौमों के सामने शर्मिंदा करती है। इसका सबसे भयानक पहलू यह है कि उनके धार्मिक विचारों के बारे में ज्यादा से ज्यादा गलतफहमी पैदा हो रही है। आतंकियों की बर्बरता के लिए इस्लाम पर आरोप लगाना उचित नहीं है, लेकिन जब आतंकी इस्लाम का लिबास ओढ़ते हैं तो वह नाम मात्र की ही सही, इस्लाम की पहचान को अपना लेते हैं। इस्लाम तो यह सीख देता है कि अत्याचार पर चुप्पी साधे रहना और उसकी निंदा न करना भी खुद अत्याचार ही करने करने के समान है। इस्लाम के बुनियादी स्रोत का ईमानदारी से अध्ययन किया जाए तो यही पता चलता है कि इस्लाम अपने अंदर सबको समाहित कर लेने का लचीलापन रखता है। इस्लाम का बुनियादी सिद्धांत यह कहता है कि एक मासूम की जान लेना पूरी मानवता की हत्या के समान है।

आज मुस्लिम समाज को दुनिया भर में शांति और सुरक्षा चाहने वाले लोगों के साथ मिलकर इस्लाम के इन संतुलित और सार्वभौमिक मूल्यों का प्रदर्शन करना होगा। इस्लामी दुनिया की सरकारों को ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार करना होगा जो लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा दे। दूसरों को स्वीकार करने के मानवीय मूल्य को फैलाने में मुस्लिम समाज एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उदाहरण के तौर पर भारत में ऑल इंडिया उलमा और मशाईख बोर्ड है, जिसने अब तक 30 से अधिक मुस्लिम इलाकों में सूफीमत, हिंदू-मुस्लिम संवाद और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सूफी महापंचायतों का आयोजन किया है। आतंकवाद को कभी आतंक से नहीं मिटाया जा सकता। प्रसिद्ध इस्लामी सूफी-संत हजरत निजामुद्दीन औलिया ने कहा था, यदि राह में कांटे बिछाने वालों को कांटे बिछाकर जवाब दिया जाएगा तो पूरी दुनिया कांटों से भर जाएगी। यही कारण है कि सूफी-संतों के पास हर जाति और धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के आते रहे और एक-दूसरे से जुड़ते रहे। आज भी हर धर्म और समुदाय के लोग उनके प्रति आदर रखते हैं।

आज जब दुनिया वैश्विक संकट का शिकार है तो सूफीमत का रास्ता ही समस्स्याओं का समाधान बन कर सामने आ रहा है। धार्मिक अराजकता के वैश्विक संकट के समाधान की खोज में दुनिया भर के सूफी-संत इसी वर्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा होकर वैश्विक भाईचारे और धार्मिक सौहार्द्र का संदेश देते नजर आए थे। यह सूफी सम्मलेन इसलिए बहुत महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसमें उस आतंकी हथियार को नाकाम करने की कोशिश की गई जिसकी मदद से कट्टर विचारधारा को नौजवान मुसलमानों में बढ़ावा दिया जाता है। कट्टर सलफी-वहाबी उलेमा इस्लामी विचारों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं और धर्म के नाम पर मुस्लिम युवाओं का राजनीतिक शोषण करते हैं। मुंबई के वहाबी विद्वान जाकिर नाइक भी ऐसे ही एक धर्मशास्त्री हैं। पिछले कई बरसों से भारत में धर्म के बाजार में सबसे ज्यादा कीमत अगर किसी मुस्लिम उपदेशक को मिली है तो वह जाकिर नाइक ही हैं। सऊदी अरब और विभिन्न मुस्लिम देशों से भारी रकम हासिल करके आज वह ‘पीस टीवी’ नाम के कट्टरता फैलाने वाले चैनल के मालिक हैं। जाकिर नाइक खुद को इस्लाम और दूसरे धर्मों का विद्वान कहते हैं। उन्होंने धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन में एक खास दृष्टिकोण से विशेषज्ञता प्राप्त की है। वह भारत के अलावा अन्य देशों में भी इसी हवाले से मशहूर हैं। कुछ मुसलमानों की राय में वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम के प्रचारक हैं, लेकिन वह इस्लाम की छवि बेहतर तौर पर पेश करने के बजाय व्यवस्थित तरीके से इस्लाम और मुसलमानों के बारे में खौफ ‘इस्लामोफोबिया’ फैलाने का काम कर रहे हैं। एक पश्चिमी लेखक ने काफी समय तक इस्लाम को समझने की कोशिश की। इस्लामी परंपरा, सभ्यता और अरबी भाषा के अलावा इस्लामी शिक्षाओं ने उसके अंदर इस्लाम के प्रति दिलचस्पी पैदा कर दी थी। वह इंटरनेट पर आधुनिक इस्लामी प्रचारकों, खासतौर पर जाकिर नाइक को सुनता रहा। एक दिन उसका ध्यान उनके उस बयान पर केंद्रित हो गया जिसमें नाइक ने ओसामा बिन लादेन की निंदा करने से इंकार किया। इस पर अपनी हैरानी जताते हुए उन्होंने लिखा-यह हैं जाकिर नाइक जो व्यवस्थित तरीके से इस्लाम के खौफ का प्रचार कर रहे हैं। उनके अनुसार, ‘समाज का वह हिस्सा जो इस तरह के बर्ताव को बर्दाश्त करता है वह धार्मिक उग्रवाद को फैलाने में मदद करता है। यही बर्ताव सार्वजनिक जीवन में विचार विमर्श में रुकावट डालता है। आज के पढ़े लिखे समाज में भी इस तरह के तर्क को एक बड़े समूह का समर्थन प्राप्त है। इसके बहुत ही खतरनाक नतीजे होंगे। जब तक सब लोग ये जानेंगे और इसकी तबाही से वाकिफ होंगे तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।’

जाकिर नाइक जैसे लोग हमेशा मौजूद रहेंगे जो धार्मिक मान्यताओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करेंगे। ऐसे में यह ज्यादा जरूरी है कि मुस्लिम समाज इस्लाम के आधुनिकतावादी और संतुलित सिद्धांतों को बढ़ावा दे। अपने धर्म और ईमान के अनुसार जीवन जीने का मतलब यह है कि हम सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विविधता का सम्मान करें। मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने समाज में मानव अधिकार को पर्याप्त स्तर पर बढ़ावा दें। उन्हें अपने समाज के प्रत्येक सदस्य को शिक्षा के ऐसे अवसर प्रदान करने चाहिए जहां विज्ञान और कला के साथ मानवता के लिए सम्मान उनकी संस्कृति का अटूट हिस्सा हो।

[ लेखक गुलाम रसूल देहलवी, जामिया मिलिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर एवं इस्लामी मामलों के जानकार हैं ]

 

Extracted from jagran

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