हज़रत अली (र.अ): अतिवाद और भौतिकवाद के दौर में आध्यात्मिक जीवन की इस्लामी मिसाल

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By Ghulam Rasool Dehlvi

आज जबकि हम अतिवाद और भौतिकवाद का शिकार हो रहे हैं, हज़रत अली की आध्यात्मिक ज़िन्दगी और उनके कथन से सीखना हम सब की अहम् ज़रूरत है। क़ुरान का फरमान कि “उत्पाद, क्रूरता करने वाला अल्लाह का दोस्त नही हो सकता”, इस बात की तरफ इशारा है की अगर एक बंदे को हज़रत अली जैसी पवित्र ज़िन्दगी गुजारनी है तो हिंसा, क्रोध और अतिवाद का रास्ता छोड़ कर, आध्यात्मिक राह एखतियार कर लेनी चाहिये, यही इस्लाम में विलायत का वास्तविक सार है……

ग़ुलाम रसूल देहलवी

इस्लाम के चौथे खलीफा, पहले वली और महान आध्यात्मिक गुरु और  हज़रत इमाम अली (र.अ) की पैदाइश अल्लाह के घर पवित्र घर मक्का शरीफ के काबा मे हुई थी।

रिवायत है कि आपकी अम्मी जान आपकी पैदाइश से पहले जब काबे शरीफ के पास गयीँ, तो अल्लाह के हुक्म से काबे की दीवार ने आपकी मां को रास्ता दे दिया था। उनके काबे मे तशरीफ लाने के चार दिन बाद 13 रजब को हज़रत अली पैदा हुए।

उन्हें बचपन में ही पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स।अ।व) के पवित्र घर में पैगंबर द्वारा पाला पोसा गया और आध्यात्मिक तौर पर प्रशिक्षित किया गया। अल्लाह के आदेश और रसूल के आशीर्वाद पर वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पचपन में ही इस्लाम स्वीकार किया। उस समय उनकी आयु कम से कम दस या ग्यारह वर्ष की थी।

हदीस में है कि हज़रत अली (र.अ) से प्यार करना पैगंबर से प्यार करना है और उनसे प्यार करना अल्लाह पर विश्वास रखने उसकी इबादत रखने के सामान है। पता चला अली के प्रेम द्वारा ही रसूल का आशीर्वाद हासिल किया जा सकता है।

हज़रत अली की शादी पैगंबर (स.अ.व) की बेटी और महान इस्लामी हस्ती हज़रत फातिमा (र.अ) से हुई। दोनों का घर और जीवन निर्दोषता और आध्यात्मिकता का उदाहरण था।

हजरत अली के आध्यात्मिक उपाख्यान:

इंसान मायूस और परेशान इसलिए होता है, क्योंकि वो अपने रब को राज़ी करने के बजाये लोगों को राज़ी करने में लगा रहता है।

कभी भी अपनी जिस्मानी ताकत और दौलत पर भरोसा न करना क्युँकि बीमारी और ग़रीबी आने में देर नही लगती!

अगर दोस्त बनाना तुम्हारी कमज़ोरी है, तो तुम दुनिया के सबसे ताक़तवर इंसान हो।

इन्सान का अपने दुश्मन से इन्तकाम का सबसे अच्छा तरीका ये है कि वो अपनी खूबियों में इज़ाफा करे!

ताक़त और दौलत ऐसी चीजें हैं जिनके मिलने से लोग बदलते नहीं, बेनक़ाब होते हैं।

कभी तुम दुसरों के लिए दिल से दुवा मांग कर देखो तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी

किसी की आँख तुम्हारी वजह से न भीगे, क्योंकि तुम्हे उसके हर इक आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा।

किसी की बेबसी पर मत हसो ये वक़्त तुम पे भी आ सकता है।

जब रब की नेमतों पर शुक्र अदा किया जाए तो वह कभी ख़त्म नही होती।

ज़िल्लत उठाने से बेहतर है तकलीफ उठाओ।

हमेशा ज़ालिमों का दुश्मन और मज़लूमो का मददगार बन कर रहना चाहिए।

जाहिल के सामने अक़्ल की बात मत करो, पहले वो बहस करेगा फिर अपनी हार देखकर दुश्मन हो जायेगा।

आज जबकि हम भौतिकवाद का शिकार हो रहे हैं, हज़रत अली की आध्यात्मिक ज़िन्दगी और उनके कथन से सीखना हम सब की अहम् ज़रूरत है। बेशक़ क़ुरान का फरमान कि “उत्पाद, क्रूरता करने वाला अल्लाह का दोस्त नही हो सकता”, इस बात की तरफ इशारा है की अगर एक बंदे को हज़रत अली जैसी पवित्र ज़िन्दगी गुजारनी है तो हिंसा, क्रोध और अतिवाद का रास्ता छोड़ कर, आध्यात्मिक राह एखतियार कर लेनी चाहिये, यही इस्लाम में विलायत का वास्तविक सार है।

ग़ुलाम रसूल देहलवी भारतीय सूफी परंपरा से जुड़े एक इस्लामी विद्वान, अरबीउर्दूहिंदी-अंग्रेजी लेखक और मुस्लिम मामलों के विशेषग्य हैंEmail: grdehlavi@gmail.com

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