हज़रत मुहम्मद (सल्ल) के विषय में गैर मुस्लिम विद्वानो के विचार

वर्षा शर्मा

यह बात सर्व सिद्ध है की हज़रत मुहम्मद (सल्ल) पढ़ना- लिखना नही जानते थे और यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है की आपके पैग़म्बर होने तक किसी धर्म का कोई ग्रन्थ आप तक नही पहुंचा था, विचार करने योग्य बात यह है की ऐसे विद्या और ज्ञान शुन्य देश और जाति में पैदा होकर और उसी में जवान होकर भी आपको इतना ज्ञान कहा से प्राप्त हो गया कि आपने इतना बड़ा सार्वभौम और विश्वव्यापी धर्म चला दिया? एक देश में इतनी बड़ी क्रांति उत्पन्न कर दी? आपके द्वारा चलाये हुए धर्म ने संसार के सरे देशो, जातियों और सभ्यताओ पर भी प्रभाव डाला। भारत जैसा धर्म, संस्कृति और विद्या तथा ज्ञान से संपन्न देश भी इस्लाम के प्रभाव  से नही बचा तथा आपके बाद अब तक कोई इतना बड़ा धार्मिक नेता नही हुआ।

महान व्यक्ति

क़ुरान के अनुवादक रेवरेंड जी. एम. रडवेल लिखते है:

“यह अदभुद और आश्चर्जनक नमूना है उस व्यक्ति और आत्मा का जो ऐसे शख्स में होती है, जिसको खुदा और परलोक पर दृणता के साथ विश्वास होता है और जो अपने महान व्यक्तित्व और सत्यतापूर्ण आचरण के कारन हमेशा उन लोगो में गिना जायेगा, जिसको मानव जाति के विश्वास, आचार और सारे सांसारिक जीवन पर ऐसा पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है, जो किसी अत्यंत महान कोटि के व्यक्ति के सिवा किसी और को नही प्राप्त हुआ और न हो सकता है”।

नारी उद्धारक

मिसेज एनीबेसेंट अपने लेक्चर में कहती है:

“आप ज़रा हमारे पैग़म्बर का ख़्याल कीजिये और इस स्थिति की कल्पना कीजिये जब केवल उनकी पत्नी ही उन पर ईमान लायी है, इसके बाद अत्यंत निकटम सम्बन्धी उन पर ईमान लाते है, इस बात से भी मुहम्मद (सल्ल) के विषय में कुछ न कुछ पता चलता है। एक ऐसे समूह में से अनुयायी पैदा कर लें सहज  है, जो आपको नही जनता लेकिन अपनी पत्नी, बेटी और अपने दामाद और दूसरे निकटवर्ती सम्बन्धियों  की नज़रों में नबी बनना वास्तव में नबी बनना है और यह एक ऐसी विजय है, जो हज़रत ईसा को भी प्राप्त नही हुई”।

“हज़रत मुहम्मद (सल्ल) के चरित्र का वर्णन करते हुए  मिसेज एनीबेसेंट कहती है:

“वास्तव में वह ईश्वर दूत थे।  लेकिन इसके बावजूद वह ऐसे मित्वयाताप्रिय, सरल और नम्र है की अपने फटे हुए कपड़ो को खुद ही पाबंद लगा देते है, अपने जूतों की खुद मरम्मत कर लेते है। विशेषकर ऐसी हालत में की हज़ारों (लाखों) आदमी उन्हें नबी और रसूल कहकर उनके सामने नतमस्तक होते थे।”

सर्वाधिकार प्रमाणिक और सच्चा जीवन चरित्र

‘अपलोजी फॉर मुहम्मद एंड क़ुरआन’ के रचयिता जान डेविड पोर्ट लिखते है:

“मुहम्मद (सल्ल) की सत्यता और शुद्ध हृदयता का प्रबल प्रमाण यह है की सबसे पहले जो लोग उन पर ईमान लाए (यानी मुस्लमान हुए) वे उनके घरवाले और उनके निकत्सम्बन्धी हैं, जो उनके घरेलू जीवन से पूर्णतया  परिचित थे। अगर उनमें सच्चाई और सत्यता न होती, तो वे ज़रूर आपत्तियों और विरोधों का तूफ़ान खड़ा कर देते। इसमें संदेह नही की समरत लेखकों और विजेताओ में एक भी ऐसा नही जिसका जीवन चरित्र उनसे अधिक विस्तृत और सच्चा हो।”

सीधी-सच्ची राह दिखने वाले 

मैं  पैगंबरे  इस्लाम  की जीवनी  का अध्यन कर रही थी। जब मैंने किताब का दूसरा भाग ख़त्म कर लिया, तो मुझे दुःख हुआ कि इस महान प्रतिभाशाली जीवन का अध्यन करने के लिए अब मेरे पास कोई किताब बाकि नही। अब मुझे पहले से भी ज़्यादा विश्वास हो गया है की यह तलवार की शक्ति न थी, जिसने इस्लाम के लिए विश्व क्षेत्र में विजय प्राप्त की, बल्कि यह इस्लाम के पैग़म्बर का अत्यंत  सादा जीवन, आपकी निःस्वार्थता, प्रतिज्ञापालन और निर्भयता थी। आपका अपने मित्रो और अनुयायियों से प्रेम करना और ईश्वर पर भरोसा रखना था। यह तलवार की शक्ति नही थी, बल्कि ये सब विशेषतायें और गुण थे, जिनसे सारी बाधाएं दूर हो गयीं और आपने समस्त कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर ली।

जिस समय हज़रत मुहम्मद (सल्ल) उद्दीयमान हुए, सारे अरब में मूर्तिपूजा ज़ोरो पर थी, हर और शिर्क (बहु ईश्वर-पूजा) का बोल-बाला था, ईश्वर का विश्वास लुप्त हो रहा था, लेकिन उसकी उपासना से लोग कोसो दूर थे, धार्मिक पाखंडो का ज़ोर था। ऐसे समय में आपने ईश्वर के एकत्व की ऐसी घोषणा की कि उसकी गूँज से अरब में एक नयी दुनिया आबाद हो गयी।  हज़रत (सल्ल) को लोगो ने तरह-तरह के कष्ट दिए, क्यूंकि आप अदित्य ईशवर का सन्देश सुनते थे। आपको लोगो ने बहुत परेशान किया, क्यूंकि आप लोगो को एक पूज्य की ओर आकर्षित करते थे, लेकिन ऐसे महान और तेजस्वी व्यक्ति इन कठिनाइयों से कब भयभीत होते हैं, जो अपने आप को ईश्वर की याद में पाते हैं।  वे दुनिया वालो को कब ध्यान में लाते हैं, दुनिया से वे कब डरते हैं? दुनिया उन्हें खरीद नही सकती, न वे अपमान से घबराते न प्रशंसा से मोहित होते हैं।  उनकी दृष्टि में इन चीज़ों का कोई मोल नही होता। आज करोड़ों मुसलमान दिन में कई बार ईश्वर के इस पवित्र संदेशदाता का नाम श्रद्धा और प्रेम से लेते हैं। लेकिन उनसे कहीं  बढ़कर वे लोग मुहम्मद (सल्ल) के प्रशंसक है, जो यद्यपि  मेरे सामान उनकी घोषणा में अपनी धीमी आवाज़ शामिल करते हैं और दिन-रात  उनकी  इस कृति को याद रखते हैं कि आपने जो भूली भटकी दुनिया को नए सिरे से  वास्तविक सत्यमार्ग दिखाया और पाठ पढ़ाया।

वर्षा शर्मा जामिया मिलिया इस्लामिया (नई दिल्ली) से धर्मों के तुलनात्मक अध्यन (Comparative Religions) में M. A. हैं।

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