Al-Walaa Wal-Bara’a (Loyalty and Enmity) Explained अल वला (दोस्ती) वल-बरा (दुश्मनी) का सही मतलब

WordForPeace.com

आम तौर पर मुस्लिम अवाम में अल-वला (दोस्ती) वल-बरा (दुश्मनी) का एक ग़लत तसव्वर पेश किया जाता है. उन्हें समझाया जाता है के जो भी मुसलमान नहीं है, वो उनका दुश्मन है. इसलिए वो सिर्फ किसी मुस्लिम के साथ ही अच्छा सुलूक जाएज़ समझते हैं. ऐसा इसलिए है क्युकि उन्हें कुरान की इस आयात का सही मतलब नहीं समझाया जाता, जिसमे कहा गया है:

“ऐ ईमान वालो, याहुद-ओ-नसारा (Jews and Christians) को दोस्त न बनाओ. वो आपस में एक दुसरे के दोस्त हैं. तुम में से जो भी उनसे दोस्ती रखेगा वो उन्ही में से है. बेशक, अल्लाह बे-इन्साफ लोगो को राह नहीं दिखाता” (कुरान: 5:51).

इस आयत का मतलब वो लोग ये समझते हैं के सभी नॉन-मुस्लिम्स उनके दुश्मन हैं; इसलिए उनके साथ हर तरह का मामला (interaction) खत्म कर देना चाहिए. जबकि इस आयत का सही मतलब ये नहीं है. इसका कुरानी मफहूम ये है के जंग के हालात में कुछ तदबीरें (war tactics) होती हैं. उन्ही में से एक ये है कि दुश्मन की चालों को समझा जाये और उन्हें अपना दोस्त न मान लिया जाये, हालांकि इस आयत में उनके साथ भलाई करने से नहीं रोका गया है.

इससे पता चला के अल-वला वल-बरा सिर्फ जंग के दौरान लागू होने वाली चीज़ें हैं, कोई आम मज़हबी या फ़रीज़ा नहीं. इनका निफाज़ (Application) सिर्फ जंगी तदबीर यानी ‘war tactic’ के तौर पर हुआ था, वो भी उस वक़्त जब मुसलमानों पर दुश्मनों की तरफ से हमला हुआ. उस वक़्त उनके लिए एक मुनासिब तदबीर थी. आज भी दुनिया की हर country और  nation में इस उसूल को माना जाता है. आज भी जंग के दौरान दुश्मन (publicly recognized enemy) के साथ दोस्ती कुबूल नहीं की जाती.

अल-वरा वल-बरा के इस मफहूम का सबूत ये है के कुरान और सुन्नत में बार-बार non-Muslims के हुकूक को पूरा करने और उनके साथ भलाई करने का हुक्म दिया गया है, जैसा कि इस आयत में:

अल्लाह तुम्हे इस बात से मना नहीं फरमाता कि जिन लोगों ने तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में जंग नहीं की, और न तुम्हे तुम्हारे घरों से निकाला कि तुम उनसे भलाई और नेकी का सुलूक करो और उनके साथ इन्साफ करो. बेशक, अल्लाह इन्साफ करने वालो को पसंद करता है”. (60:8).

ये आयत हमें non-Muslims के साथ इन्साफ करने का हुक्म देती है, और इन्साफ करने से पहले भलाई करने का हुक्म देती है. उनके साथ इन्साफ करने का मतलब ये है के हम उन्हें उनके हुकूक दें, और उनके साथ भलाई करने का मतलब ये है के ज़रूरत पड़ने पर उनके लिए हम खुद अपने बाज़ हुकु से समझौता करलें.

मशहूर आलिमे दीन इमाम शिहाबुद्दीन अल-क़रफी (1228-1285) ने इसका मतलब ये बताया है:

उनके कमजोरों के साथ भलाई की जाये, उनके ग़रीबों की मदद की जाये, उनके भूकों को खाना खिलाया जाएँ, उनके राज़ अफशा न किये जाये, उनके दीन, जान और खानदान की हिफाज़त की जाये”.

इमाम अल-कुर्तुबी ने फ़रमाया है कि:

“कुरान में ग़ैर मुस्लिमों के साथ भलाई करने की आयत बिलकुल ज़ाहिर है. इसका माना ये है कि इस्लाम में ग़ैर मुस्लिमों के साथ बेहतर सुलूक करना ही आम हुक्म (नॉर्म) है.”

इसकी अमली मिसाल (practical example) रसूल करीम (SAW) ने पेश की. आप नॉन-मुस्लिम मरीजों की इयादत करते थे, उन्हें तोहफे (gifts) पेश करते थे, उनके तोहफे कुबूल फरमाते थे. आप (SAW) ने अपनी ज़िन्दगी नॉन-मुस्लिम के साए में ही गुजारी, उन्हें उनके पसंद के खाने की इजाज़त दी, उनके चर्च और इबादत खानों की हिफाज़त का हुक्म दिया, उनके मज़हबी रहनुमाओं (priests) के साथ भलाई की, नजरान के Christians को मस्जिदे-ए-नबवी में जगह दी, उन्हें उनके मज़हब के मुताबिक इबादत करने की इजाज़त दी.

तो क्या आजके इन्तिहापसंद (extremists) रसूल (SAW) से भी ज्यादा जानकार और मज़हबी हैं?

क्या वो रसूल (SAW) से भी ज्यादा अल-वला वल-बरा का मतलब समझते हैं?

Check Also

Why no mandate for the UN Kashmir report? Ghulam Rasool Dehlvi in Sunday Guardian

WordForPeace.com Why did the UN High Commissioner for Human Rights make this “special report”, while …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *