Ghulam Rasool Dehlvi in Dainik Jagran in all India editions: शब-ए-मेराज: पैगंबर मुहम्मद (स.) की आध्यात्मिक यात्रा की रात

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बेशक़ अल्लाह का फरमान कि “उत्पाद, क्रूरता करने वाला अल्लाह का दोस्त नही हो सकता”, इस बात की तरफ इशारा है की अगर एक बंदे को मेराज जैसी पवित्र यात्रा की बरकत हासिल करना है, तो हिंसा, क्रोध और अतिवाद का रास्ता छोड़ कर, आध्यात्मिक राह पकड़ लेनी चाहिये, यही शब-ए-मेराज का वास्तविक सार है।………………….
इसरा और मेराज जिसे “अल-इसरा-वल-मेराज” भी कहा जाता है, इस्लामी कॅल्न्डर के अनुसार रजब माह (सातवाँ महीना) में 27वीं तिथि को मनाया जाता है, जब पैगंबर मुहम्मद को ईश्वर (अल्लाह) ने पहले मक्का से यरोशेलम और फिर सारे ब्रह्माण्ड की आध्यात्मिक यात्रा कराई।
 इस्लाम धर्म के मानने वालों के अनुसार यह यात्रा एक ऐसे आत्मिक सन्देश से रूबरू कराती है, जहाँ  मुसलमान अपनी पूरी ज़िंदगी का लेखा- जोखा अपने रब्ब के सामने रख कर अपने पिछ्ले सारे गुनाहों को माफ़ कराने की उम्मीद से पूरी रात इबादत में गुज़ार देता है।
मेराज की रात में इस पूरी यात्रा के दौरान एक ऐसा चरण “सिद्रतुल मुंतहा” भी आया जहाँ देवदूत जिब्रील ने भी आगे जाने से इनकार कर पैगंबर मुहमद को आप ही आगे बढ़ने का अनरोध किया।  माना जाता है की पैगंबर मुहमद उस स्थान तक भी चले गये जहाँ ” ईश्वर का सिंहासन” है और  यहाँ से उन्होंने “हौज़-ए-कौसर” (घ्यान का झरना) से पानी पिया और बाद मैं लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए धरती पर वापस चले आए।
 हालांकि क़ुरान में मेराज का उल्लेख विस्तार से नही मिलता है लेकिन हदीस की किताबों मैं इस घटना को काफ़ी विस्तृत तौर पर पर बयान कियागया है।  जहाँ क़ुरान में इस बात की तरफ इशारा है कि इस पूरी यात्रा का उद्देश्य यह है  की ईश्वर (अल्लाह) ने अपने परमप्रिय नबी को वो सारी निशानियाँ दिखाई जिसका सौभाग्य पहले किसी पैगंबर को प्राप्त ना हुआ था।  इस्लाम धर्म के अनुसार हज़रत आदम से लेकर हज़रत मुहम्मद तक कुल एक लाख चालीस हज़ार पैगंबर समय समय से धरती पर उतारे गये हैं और उन्होंने अपने अपने दौर के लोगों का मार्गदर्शन किया।
क़ुरान ने तो नमाज़ को मोमिन की मेराज के बराबर दर्जा दिया है, इस का मतलब साफ है की अगर सच्ची श्रधा से ईश्वर की आराधना की जाये तो बदले में उसे वही स्थान मिलेगा जो पैगंबर मुहम्मद को मेराज वाली रात मैं मिला था।  साल भर मैं शब-ए-मेराज एक ऐसी अकेली रात है जो एक मुसलमान को यह सोचने पर मजबूर करती है कि उसका अस्तित्व केवल ईश्वर की उपासना के लिए है।  इंसान, परमेश्वर की सब से सर्वश्रेष्ठ रचना है और धरती पर उसका भेजा जाना एक उपहार से कम नही।
 ज़रूरत इस बात की है हम सब ज़िंदगी के इस तोहफे की सही कीमत समझ कर एक दूसरे के साथ अमन औरभाई चारे से रहें ताकि परमेवर (अल्लाह) खुश हो कर तमाम इंसानों के लिए अपने अनमोल ख़ज़नों के दरवाज़े खोल दे।
बेशक़ अल्लाह का फरमान कि ” उत्पाद, क्रूरता करने वाला अल्लाह का दोस्त नही हो सकता”, इस बात की तरफ इशारा है की अगर एक बंदे को मेराज जैसी पवित्र यात्रा की बरकत हासिल करना है, तो हिंसा, क्रोध और अतिवाद का रास्ता छोड़ कर, आध्यात्मिक राह पकड़ लेनी चाहिये, यही शब-ए-मेराज का वास्तविक सार है।

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