How ISIS attacks the Dignity of the Rightly-Guided Caliphate खिलाफते राशदा की नामूस पर आईएस (दाइश) का हमला

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Maulana Ghulam Ghaus

आईएसआईएस (दाइश)की स्वयंभू ‘खिलाफत’इस्लाम विरोधी तत्वों,सिद्धांतों और विध्वंसक उद्देश्यों पर आधारित एक आधुनिक खारजी संगठन है। आईएसआईएस के गैर इस्लामी कार्यों और चरित्र का विश्लेषण कर लेने के बाद यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है कि आईएसआईएस केवल इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने और विशेषकर खिलाफत ए राशदा के पवित्र अवधि की इज़्ज़त व नामुस को कलंकित करने के लिए ही उपस्थिति में आई है…..

आईएसआईएस (दाइश) की स्वयंभू ‘खिलाफत’ इस्लाम विरोधी तत्वों, सिद्धांतों और विध्वंसक उद्देश्यों पर आधारित एक आधुनिक खारजी संगठन है। मीडिया की रिपोर्टों और आईएसआईएस के गैर इस्लामी कार्यों और चरित्र का विश्लेषण कर लेने के बाद यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है कि आईएसआईएस केवल इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम करने और विशेषकर खिलाफत ए राशदा के पवित्र अवधि की इज़्ज़त व नामुस को कलंकित करने के लिए ही उपस्थिति में आई है। इस आधुनिक बाहरी संगठन ने दुनिया भर में इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जो हालात पैदा किए हैं इसके जवाब में केवल यह कहना कि आईएसआईएस का इस्लाम से कोई संबंध नहीं और अपना दामन झाड़कर चुप हो जाना ही काफी नहीं बल्कि जरूरत इस बात की भी है कि आईएसआईएस ने कुरआन और सुन्नत की जिन शिक्षाओं का गलत अर्थ जनता और गैर मुस्लिमों के सामने पेश किया है उनकी सही समझ और शिक्षा दी जाए और इस्लाम के बारे में लोगों को अधिक गलतफहमीयों का शिकार होने से रोका जाए।

अब यह कहना अनुचित न होगा कि इस्लाम के खुले दुश्मन का सामना करना इस आधुनिक खारजी वहाबी संगठन आईएस से कहीं ज्यादा आसान है, क्योंकि आईएसआईएस ज़ाहिरी तौर पर इस्लाम और मुसलमानों के मित्र होने का झूठा दावा करती है लेकिन वास्तव में यह इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों और इसकी भाईचारे और प्रेम पर आधारित शिक्षाओं को विकृत करने के लिए हर संभव घात में लगी हुई है। जनता को यह बात जान लेना बेहद जरूरी है कि आईएसआईएस मुसलमानों के बहुमत को मुशरिक व मुर्तद करार देकर उन्हें बेरहमी से हत्या करने को ही अपना अकीदा और ‘जेहाद ‘मानती है।

जिस तरह वहाबियों के इमाम इब्ने अब्दुल वहाब ने अरब और अजम के सूफी सुन्नी मुसलमानों पर शिर्क और बिदअत का आरोप लगाकर लाखों मुसलमानों की हत्या करवाया और अरब में वहाबी सरकार स्थापित किया था,ठीक उसी तरह आईएसआईएस भी अपनी तथाकथित खिलाफत के प्रति उन मुसलमानों की हत्या करवाना चाहती है जो उनके वहाबी अकीदे और विचारों को नहीं मानते, और इस तरह वह इराक और सीरिया और दुनिया भरमें वहाबी सरकार स्थापित करना चाहती है।

कुछ ऐसे लोगों से मेरा सामना हुआ जो अपनी अज्ञानता और पुस्तकों के अध्ययन न करने के कारण इब्ने अब्दुल वहाब की इस प्रसिद्ध वास्तविकता को मानने से इनकार कर देते हैं और कहते फिरते हैं कि उनके अब्दुल वहाब नजदी ने सुन्नी मुसलमानों को क़त्ल करने का कोई फतवा नहीं दयाl तो आईेए संक्षेप में हम समीक्षा करें कि इस बारे में इब्न अब्दुल वहाब नजदी का क्या स्टैंड है।

वहाबियों के इमाम मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी मृतक 1206हिजरी सुन्नी मुसलमानों के बारे में लिखते हैं:

अरबी से अनुवाद ” तुम जान चुके हो कि उन लोगों (सुन्नी मुसलमानों) के तौहीद ए रुबुबियत का इकरार करना उनको इस्लाम में प्रवेश नहीं करता,और यह जो मलाइका और नबियों का क़स्द करते हैं और उनकी हिमायत का इरादा करते हैं और अल्लाह के तक़र्रुब का इरादा करते हैं इस चीज़ ने उन्हें क़त्ल करने और उनके माल लूटने को मुबाह (वैद्ध) कर दिया है। ” (कशफ़ुल शुबहात पृष्ठ 9, मक्तबतुस्सल्फिया बिल मदीना मुनव्वरा, 1389 हिजरी)

शेख मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब के भाई सही अकीदे के मुसलमान थे,वह शेख मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी की निन्दा का अस्वीकार करते हुए लिखते हैं:”मुसलमानों की निन्दा के बारे में तुम्हारा रुख इसलिए भी सही नहीं है कि अल्लाह के गैर को पुकारना और नज़र व नियाज़ बिल्कुल कुफ्र नहीं यहां तक कि इसके दोषी मुसलमान को मिल्लते इस्लामिया से बाहर कर दिया जाए, क्योंकि हदीस सहीह में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:”संदेह के आधार पर हुदूद सकित कर दो ”। (तारीख बगदाद जिल्द 9 पृष्ठ 303)। और हाकिम ने अपनी सहीह में और अबू अवाना ने अल बज़ार में सही प्रमाण के साथ रिवायत की है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ” जब किसी व्यक्ति की सवारी किसी निर्जल रेगिस्तान में खो जाए तो वह तीन बार कहे हे इबादुल्लाह!मुझे अपनी सुरक्षा में ले लो तो अल्लाह के कुछ बंदे हैं जो उसको अपनी सुरक्षा में ले लेते हैं। ” (मुसनद अल बज़ार: 3128 अमलुल यौम व लैलतुन्निसाई: 558) और तबरानी की रिवायत है कि ” अगर वह व्यक्ति सहायता चाहता हो तो यूँ कहे कि ऐ अल्लाह के बन्दों!मेरी मदद करो ”। (अल मोजमुलकबीर:10518)। इस हदीस को फ़ुक़्हा ए इस्लाम ने क़ुतुब ए जलीलह में ज़िक्र किया है और इसका प्रकाशन किया है और विभिन्न फ़ुक़्हा ए किराम में से किसी ने उसका इनकार नहीं किया है। इसलिए इमाम नौवी शाफई मृतक 676हिजरी ने “किताबुल अज़कार: 807” में इसका उल्लेख किया है, और इब्ने कैयिम ने अपनी पुस्तक “अल कल्मुल तैयिब” में इसका जिक्र किया है और इब्ने मुफलेह ने “किताबुल आदाब” में इस हदीस का उल्लेख करने के बाद लिखा है: ” हज़रत इमाम बिन हंबल के पुत्र बताते हैं कि मैं अपने पिता (यानी इमाम अहमद बिन हंबल मृतक 241 हिजरी) से सुना, वह कहते थे: ” मैंने पाँच बार हज किए हैं, एक बार में पैदल जा रहा था और रास्ता भूल गया, मैंने कहा: हे इबादुल्लाह! मुझे रास्ता दिखाओ, मैं यूं ही कहता रहा यहां तक कि मैं सही रास्ते पर आ लगा”। अब मैं यह कहता हूँ कि जो व्यक्ति किसी गायब या फौत शुदा बुजुर्ग को पुकारता है और आप इसे काफिर कहते हो बल्कि तुम केवल अपने गलत अटकलों से यह कहते हो कि उस व्यक्ति का शिर्क उन मुशरिकीन से भी बढ़कर है जो खुश्की और तरी में पूजा हेतु गैरुल्लाह को पुकारते थे, और उसके रसूल की बरमला तक़ज़ीब करते थे,क्या तुम इस हदीस या इसके मकसद पर उलमा और इमामों की प्रक्रिया को उस व्यक्ति के लिए वास्तविक नहीं बताते कि बुजुर्गों को पुकारता है और केवल अपने फासिद कयास से इसको शिर्क करार देते हो। انا للہ وانا الیہ راجعون। जबकी संदेह से हद सकित हो जाती हैं तो इस मजबूत मूल के आधार पर ऐसे व्यक्ति से तकफीर क्यों न सकित होगी। तथा मुख्तसरुरौज़ा में कहा है: जो व्यक्ति तौहीद और रिसालत की गवाही देता हो उसे किसी बिदअत के आधार पर काफिर नहीं कहा जाएगा। ‘ (अल सवाइकुल इलाहिया: पृष्ठ 34, 35, मकतबा इशीक, इस्तांबुल)

इस बात को दारुल उलूम देवबंद के प्रधान अध्यापक हुसैन अहमद मदनी मृतक 1377हिजरी नें भी स्वीकार किया है, वह मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब मृतक 1206 हिजरी के संबंध में लिखते हैं: ” साहब! मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी तेरहवीं सदी में नजद अरब से ज़ाहिर हुआ और चूंकि यह गलत विचार और फासिद अकीदा रखता था इसलिए उसने अहले सुन्नत वल जमाअत से क़त्लो केताल (मार काट) किया, उन्हें बलपुर्वक अपने विचारों की तक़ज़ीब देता रहा, उनके माल को गनीमत का माल और हलाल (वैध) माना गया, उनकी हत्या को सवाब और रहमत का काम शुमार (गिनती) करता रहा, ख़ास तौर पर हरम वालों को और आमतौर हिजाज़ वालों को बहुत अधिक तकलीफ पहुंचाया, सलफे सालेहीन और  की शान में बहुत बेअदबी और गुस्ताख़ी के शब्द इस्तेमाल किए, कई लोगों को उसकी तकलीफ ए शदीदह के करण मदीना और मक्का छोड़ना पड़ा और हजारों आदमी उसके और उसके सेना के हाथों शहीद हो गए। सबका सार यह कि वह एक तानाशाह और विद्रोही, खूंख्वार, अनैतिक व्यक्ति था, इसी कारण अहले अरब को विशेषतः उससे और उसके अनुसरण करने वालों से हार्दिक दुश्मनी थी और है,और इतना है कि इतना यहूदीयों से है ना ईसाईयों से है ना मजूसीयों से है और ना हिन्दुओं से है ”। (देखिए ‘ अश्शाहाबुल सकीब: पृष्ठ 42, मीर मोहम्मद कुतुबखाना, कराची’)

अल्लामा मोहम्मद अमीन बिन उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ अल दमिश्क़ी मृतक 1252 हिजरी लिखते हैं: ” जिस तरह हमारे ज़माने में मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब का अनुसरण करनें वाले हैं,जो नजद से निकले और हरमैन पर हावी हो गए और वह खुद को मजहबे हनाबलह की तरफ मंसूब करते है लेकिन उनका मानना है कि वही मुसलमान हैं और जो उनके एतेक़ाद में विरोधी हो वह मुशरिक है और इसलिए उन्होंने अहले सुन्नत की हत्या को और उलेमा की हत्या को जायज करार दिया। ” (रद अल मुहतार अल शामी: खंड 6 पृष्ठ 317, दारुल अहया अत्तुरासुल अरबी, बेरूत, 1419 हिजरी)

मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब नजदी से संबंधित उपरोक्त उल्लेखित लेखन को पढ़ने के बाद अब लोगों को इस में कोई शक की गुंजाइश नहीं रखना चाहिए कि मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब नजदी ने सुन्नी मुसलमानों की हत्या पर अपने विश्वासियों और अनुयायी को उभारा था और यह वहाबी नजदी अक़ीदे का ही नतीजा है कि आईएसआईएस इराक और सीरिया में सुन्नी मुसलमानों का नरसंहार कर रही है। अब रही बात पहचान की तो विचारणीय बात यहाँ यह है कि सुन्नी होनें का दावा वहाबी भी करते हैं लेकिन वास्तव में वह इस भेष में रह कर सुन्नी मुसलमानों के अकाएद ए मामुलात मसलन,नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुल्ली ईल्मे गैब का अकीदा, अदमे इमकान बारी तआला का अकीदा, तवस्सुल, फातिहा, मिलाद, अम्बिया व औलिया के मज़ारात की हाजरी आदि पर हमला कर रहे हैं। अगर आप भारत व पाक और यहां तक कि विदेशों में सुन्नी मुसलमान की सही पहचान और इशारा जानना चाहते हैं तो जवाब में कहूंगा कुरान और सुन्नत वाले सुन्नी मुसलमान, सहाबा वाले सुन्नी मुसलमान इमाम मातरीदी वाले सुन्नी मुसलमान,चार इमामों वाले सुन्नी मुसलमान,गौस आजम वाले सुन्नी मुसलमान ,ख़्वाजा ख्वाजगान वाले सुन्नी मुसलमान और इमाम अहमद रजा बरेलवी वाले सुन्नी मुसलमान ही सही मायने में सुन्नी मुसलमान हैं। हालांकि आज गैरों ने मुसलमानों को बरैलवी कहना शुरू कर दिया है लेकिन यही हज़रात सुन्नी मुसलमान हैं, और यही हैं वे जिन्हें आप अहले सुन्नत वल जमाअत से भी ताबीर करते हैं।

दुनिया भर में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सोशल मीडिया पर ज्ञान के नाम पर अज्ञानता,ना समझी और रूढ़िबद्धता के ऐसे सबक पढ़ते पढ़ाते दिखाई देते हैं कि इस प्रकाशित युग में उनके ज्ञान और कौशल पर अफसोस का हाथ मलना पड़ता है। और कुछ ऐसे भी हैं जो आईएसआईएस और इस जैसी अन्य संगठनों के बुरे कार्यों को आधार बनाकर दुनिया भर के मुसलामानों को पृष्ठ भुमि से मिटा देने के नापाक ईरादे की ओर बढ़ रहे हैं और केवल यही नहीं बल्कि इस्लाम और मुसलमानों के पारंपरिक दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं। वह आईएसआईएस और इस जैसे संगठनों को तर्क और दलील बनाकर खुलेआम इस्लाम और खिलाफते राशदा का मजाक बना रहे हैं, महान इस्लामी हस्तियों को बदनाम कर रहे हैं और अपने तमाम उपायों के जरिए कमजोर ईमान वाले मुसलमानों को बिगाड़ने में सफल भी हो रहे हैं। इस तरह, वे इस्लाम और उसके अनुयायियों के खिलाफ असहिष्णुता और कट्टरता और हिंसा की नींव रख रहे हैं। सांप्रदायिकता के भावनाओं और जज्बात को बढ़ावा देना, तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करके जनता को गुमराह करना, अयोग्य व्यक्तियों और दलों की सराहना, आकाश और धरती के क़ुलाबे मिला देना, राई का पहाड़ बनाना, दूसरों की खूबियों को ताक पर रखना, उन पर मोटे पर्दे डालने की कोशिश करना, सैधांतिक मुद्दों के बजाय विस्तरित और अनावश्यक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कराना, यह सब ऐसे विचार हैं जो उनके नापाक इरादों को पूरा करने के लिए दिन-रात अंजाम दिए जा रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?बेशक इन सब हालात के जिम्मेदार आईएसआईएस और इस जैसी दूसरी खारजी संगठनें हैं।

मैं मुसलमानों के बहुमत की तरह आईएसआईएस को इस्लामी संगठन नहीं मानता और इसका कारण यह है कि मैंने कुरआन और हदीस में कभी कोई ऐसा आदेश नहीं पाया जिससे आईएसआईएस के अपराधों या उसके प्रक्रियाओं का समर्थन होता हो। और इसलिए भी कि मैंने इसे खिलाफत ए राशदा की प्रणाली पर नहीं बल्कि पूरी तरह से क्रूर हत्या के खारजी सिस्टम पर आधारित पाया। निम्नलिखित में इस बात को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

इस्लाम के पहले चार खलीफा ऐसे हुए जिन्हें खुल्फाए राशिदीन कहा जाता है और इनके दौर को खिलाफते राशिदा कहा जाता है। इन चार खुलफाओं में चार सहाबी का नाम आता है जो इस प्रकार हैं, हजरत अबू बकर सिद्दीक,उमर फारूक,उस्माने गनि और हज़रत अली रदी अल्लाहु अन्हुम। इन चारों खुलफाओं का चयन पूरी स्वतंत्रता और पूरी सुरक्षा के साथ किया गया था। इसमें किसी धमकी और तलवार के किसी भी प्रभाव का कोई दखल नहीं था। जहां तक आईएसआईएस की तथाकथित ख़िलाफत का संबंध है, तो इसे युद्ध और विवाद,भय और आतंक,हिंसक वर्चस्व और दमन व बल के द्वारा लागू किया जा रहा है।

खिलाफत ए राशदा ने बहुमत या अल्पसंख्यक की परवाह किए बिना तमाम मुसलमानों को अपनी वफादारी और शासन के तहत एकजुट किया था। सभी मुसलमान न्यायपूर्ण खिलाफत ए राशदा के सिद्धांतों से खुश और संतुष्ट थे। और जहां तक आईएसआईएस की बात है तो एक हजार मुसलमानों में से एक मुसलमान भी उसके अधीन नहीं आना चाहता। इसलिए,क्या ऐसा है कि आईएसआईएस के अधीन रहने वाला हर व्यक्ति उसके स्वयंभू ‘खिलाफत’ से संतुष्ट है? वास्तव में, मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर और कोई भी इससे खुश नहीं है।

चारों खलीफाओं का चयन समाज के प्रमुख लोगों के साथ परामर्श और पुरुषों और महिलाओं सहित बड़े पैमाने पर आम मुसलमानों की भागीदारी और सहमति के साथ हुआ था जैसा कि तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रदी अल्लाहु अन्हु के चयन के समय किया गया था। और ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि दूसरे खलीफा हज़रत उमर रदी अल्लाहु अन्हु, जैसा कि बुखारी में सूचीबद्ध है, ने कहा था कि, “याद रखो! तुम में से जो कोई भी मुसलमानों के परामर्श के बिना, तुम में से किसी व्यक्ति को निष्ठा की शपथ (बैअत)  देता है या उससे निष्ठा की शपथ लेता है,तो उस निष्ठा की शपथ देने वाले या लेने वाले में से किसी का भी समर्थन नहीं किया जाएगा,कहीं ऐसा न हो कि वे मार दिए जाएं”।और ताकीद करते हुए अंत में फिर फरमाया”देखो फिर यही कहता हूँ जो कोई किसी से बिन सोचे समझे बिन विचार-विमर्श बैअत कर ले तो दूसरे लोग बैअत करने वाले का अनुसरण न करे, न उसकी जिससे बैअत की गई है क्योंकि वो दोनों अपनी जान गंवाईं होगा ” (देखिए सहीह बुखारी: किताबुल हुदूद हदीस 57)। जबकि आईएसआईएस के नेता बगदादी के बारे में हमें तो यह भी नहीं पता है कि किसनें उससे निष्ठा का वचन दिया है और किसने उसे चुना है? जबकि आईएसआईएस के नेता बगदादी के बारे में हमें तो यह भी नहीं पता है कि किसने उससे बैअत का वचन दिया है और किसने उसे चुना है? हम सिर्फ इतना जानते है कि वह एक स्वयंभू ‘खलीफा’ है और उसका समर्थन केवल उसके सहयोगियों का एक समूह ही करता है। हाँ एक ऐसा समूह जो वहाबी विश्वासों और विचारों के विकास और स्थिरता में दिन रात लगा हवा है।

चारों खलीफाओं का चयन उस समय के सभी मुसलमानों की सहमति से हुआ था। उनका चयन हर तरह के दमन व जबर्दस्ती और हिंसा के जहर से मुक्त था। लेकिन आईएसआईएस के स्वयंभू ‘खलीफा’ को अब तक मुसलमानों का समर्थन हासिल नहीं हुआ है और यही कारण है कि वह मुसलमानों को अपनी खिलाफत स्वीकार करने के लिए मजबूर कर रहा है। लेकिन दुनिया भर के मुसलमानों को यह बखूबी मालूम है कि इस्लाम में ज़बर्दस्ती की कोई गुंजाइश नहीं है। कुरआन और हदीस के शोधकर्ता और काजी इमाम मालिक बिन अनस रदी अल्लाहु अन्हु कहा करते थे कि “मजबूरी और जबरन में दी गई तलाक वैध नहीं होती, और इसी तरह मजबूरी और डर के आलम में ली गई बैअत भी गलत है”।

खिलाफत ए राशदा की प्रणाली सभी व्यक्तियों के लिए एकता, दया, करुणा और न्याय पर आधारित था। उसने मुसलमानों के बीच कभी कोई गृहयुद्ध नहीं की। लेकिन आईएसआईएस की ‘खिलाफत’गृहयुद्ध, आपसी संघर्ष,हिंसा और आतंकवाद का नेतृत्व कर रही है और मुस्लिमों और गैर मुस्लिमों दोनों पर ज़ुल्म कर रही है। आईएसआईएस के पास किसी भी सहानुभूति,दया और न्याय का कोई विचार नहीं है। इसलिए, यह खिलाफत ए राशिदा के बिल्कुल ही विरुद्ध है।

खिलाफत ए राशदा की स्थापना का मुख्य उद्देश्य कुरआन और सुन्नत की वास्तविक शिक्षाओं पर अमल करते हुए वैध और नेक इरादों और तक़्वा (अल्लाह का डर)प्राप्त करना और देश में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए शांति और सुरक्षा मुहैया कराना था। इसके विपरीत,आईएसआईएस की स्वयंभू ‘खिलाफत’सिर्फ नारे,बयान,विन्यास और उपाधियों पर आधारित है। इसका उद्देश्य इस तथाकथित ‘खिलाफत’का विरोध करने वाले सभी लोगों की हत्या करना है। अगर उनसे कुरआन और सुन्नत की शिक्षाओं के खिलाफ कोई अमल सरज़द होता है तो इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता,लेकिन अगर कोई उनके झूठे तर्क के खिलाफ कुछ कहने का साहस करता है तो उन्हें इस पर आपत्ति है। कुरआन की शिक्षा है कि एक व्यक्ति को क़त्ल करना पूरी मानवता की हत्या के बराबर है,और आकाए दो जहाँ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस कि “इस्लाम के अंदर न तो नुकसान है और ना तो नुकसान पहुँचाना है”। मगर कुरआन व हदीस की इस तरह की अन्य बहुत सारी शांतिपूर्ण शिक्षाओं को आईएसआईएस के तथाकथित खिलाफत में सबसे अधिक उपेक्षित और उसका सबसे अधिक उल्लंघन किया जाता है।

इसलिए, मेरा ये मानना है कि अगर तथाकथित ”खिलाफत” या ”खलीफा” जैसे शब्द हमेशा के लिए मुसलमानों के जीवन से गायब हो जाएं तब भी उनके ईमान में तनिक भी कमी नहीं होगी। लेकिन अगर मानवाधिकार या बंदो के अधिकार (हुकुकुल इबाद) सहित शांति, सहिष्णुता, सुरक्षा, समानता और इस्लाम के अन्य सभी नेक कार्य जैसे अल्लाह पाक और उसके प्यारे पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश केवल एक दिन या एक आन के लिए भी पठार कर लिए जाएं तो वह इतिहास में मानवता की सबसे बड़ी तबाही का दिन होगा। इस्लाम ने कभी भी हम मुसलमानों पर यह दायित्व नहीं डाली कि हम आईएसआईएस और इस जैसी स्वयंभू “खिलाफ़त” या तथाकथित “खलीफा” को स्वीकार करें। बल्कि इस्लाम ने हम मुसलमानों पर हर संभव रुप से हर नागरिक के लिए समान रूप से न्याय, शांति, सुरक्षा और समृद्धि को बनाए रखने की जिम्मेदारी डाली है।

जिस तरह खिलाफत ए राशदा के युग में सबसे बड़े आतंकवादी वह ख्वारिज थे जिन्होंने इस्लामी उपाधियों और स्वरूप का इस्तेमाल किया और चारों खलीफाओं और मुसलमानों का क़त्ले आम किया था, ठीक उसी तरह आज के इस आधुनिक युग में आईएसआईएस के ख्वारिज इस्लामी उपाधियों और स्वरूप का उपयोग कर रहे और शांतिपूर्ण वातावरण में रहने वाले मुसलमानों और गैर मुसलमानों का नाहक़ नरसंहार कर रहे हैं। इन आधुनिक ख्वारिज ने इस्लाम की छवी को ख़राब किया है,इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ गंभीर अपराध किया है और खिलाफते राशिदा के ऐतिहासिक तथ्य को विकृत किया है। उनकी वजह से आज गैरों नें आप को आतंकवादी कल्पना करना शुरू कर दिया है, इसलिए, केवल कुछ नहीं बल्कि हम सभी मुसलमानों पर अनिवार्य है कि हम अपना कदम आगे बढाएं और पूरी बहादुरी के साथ यह घोषणा करें कि आईएसआईएस की स्वयंभू ‘खिलाफत ‘एक आधुनिक खारजी संगठन है जिसका इस्लाम के साथ कोई संबंध नहीं है। हमें इस तथ्य से भी अवगत होना चाहिए कि आईएसआईएस के वहाबी अकाइद और सिद्धांत जो अत्याचार, आक्रामकता, बर्बरता, आतंकवाद और सूफी सुन्नी मुसलमानों की हत्या की शिक्षा देते हैं, इस पर लगातार मूकदर्शक बने रहना भी एक अपराध है, जिसके लिए हम लोग विशेष रूप से ज्ञान वाले अल्लाह सर्वशक्तिमान की बारगाह में जवाबदेह होंगे।

हमें आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को अपनी लड़ाई समझना चाहएl जिन गैर मुस्लिमों में इस्लाम के बारे में गलतफहमी पैदा हो गई हैं उनकी भी सुधार की जरूरत है। हमें हमारे युवा और विशेष रूप से नौ मुस्लिम युवकों को दाईशी वहाबी विचारधारा वाली ‘स्वर्ग’ के झूठे सपनों से बचाना होगा, और इससे पहले कि अधिक देर हो हमें उन्हें यह बताने की जरूरत है कि कुरआन और हदीस की शिक्षाओं को विकृत करके, सहाबा के आचरण का उल्लंघन करके, सार्वजनिक स्थानों पर बमबारी करके, निर्दोष लोगों की हत्या करके, आत्मघाती हमले प्रतिबद्ध करके और आधुनिक ख्वारिज के नक्शेकदम पर चल कर अल्लाह सर्वशक्तिमान का पवित्र स्वर्ग प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि स्वर्ग तो केवल पवित्र अक़ीदे और अच्छे कर्म के द्वारा ही हासिल किया जा सकता है। और अल्लाह बेहतर जानता है। अल्लाह सभी मुसलमानों को आतंकवादी विचारधारा और आधुनिक ख्वारिज के उत्पन्न किये हुवे झूठे वहम से सुरक्षित रखेl आमीन

गुलाम गौस सिद्दीकी देहलवी, अंग्रेजी, अरबी, उर्दू और हिंदी भाषाओं के अनुवादक और स्तंभ लेखक हैं। ईमेल: ghlmghaus@gmail.com

Source: http://www.newageislam.com/hindi-section/the-attack-of-isis-on-the-dignity-of-the-rightly-guided-caliphate–

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