Uniform Civil Code or Gender Just Laws: A Secular Perspective समान नागरिक संहिता या लैंगिक न्याय

राम पुनियानी

 

वर्तमान में पूरे देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर ज़ोरदार बहस चल रही है। कुछ मुस्लिम महिलाओं और उनके संगठनों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर मुंहज़बानी तलाक की प्रथा को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की है। न्यायालय में प्रस्तुत अपने शपथपत्र में भारत सरकार ने कहा है कि वह इस प्रथा के खिलाफ है। विधि आयोग ने एक प्रश्नावली जारी समान नागरिक संहिता के विषय पर आम लोगों के विचार आमंत्रित किए हैं। इस प्रश्नावली में मुसलमानों और ईसाईयों के पारिवारिक कानूनों के संबंध में तो प्रश्न पूछे गए हैं परंतु हिन्दू विधि के सिर्फ एक पहलू-उत्तराधिकार संबंधी नियमों-की चर्चा इस प्रश्नावली में है। इससे ऐसा लग रहा है कि शासक दल, समान नागरिक संहिता लागू करने के अपने एजेंडे पर काम कर रहा है। यह धारणा पूरी तरह से बेबुनियाद भी नहीं है। शाहबानो निर्णय के समय से ही संघ परिवार समान नागरिक संहिता की बात करता रहा है और यह हिन्दुत्ववादियों के मूल एजेंडे में शामिल है।

समान नागरिक संहिता पर बहस लंबे समय से जारी है। संविधानसभा इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करना चाहिए और उसके इस निष्कर्ष को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया गया, मूल अधिकारों में नहीं। भारत में पारिवारिक कानूनों का लंबा और जटिल इतिहास है। अंग्रेज़ों ने हमारे देश में समान फौजदारी और दीवानी कानून लागू किए। ये कानून सभी धर्मों के मानने वालों पर समान रूप से लागू होते हैं। अर्थात चोरी या हत्या करने पर किसी भी धर्म के व्यक्ति को एक-सी सज़ा मिलती है। परंतु जहां तक विवाह, तलाक, बच्चों की अभिरक्षा और उत्तराधिकार का प्रश्न है, अंग्रेज़ों ने प्रमुख धार्मिक समुदायों में प्रचलित प्रथाओं को संकलित कर उन्हें कानून का स्वरूप दे दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनमें से अधिकांश प्रथाएं पितृसत्तात्मक मानसिकता की देन थीं और महिलाओं के साथ न्याय नहीं करती थीं। पारिवारिक कानूनों में सुधार का पहला प्रयास नेहरू और अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल के रूप में किया। कदाचित, उनकी सोच यह थी कि चूंकि हिन्दू इस देश में बहुसंख्यक हैं अतः उनके पारिवारिक कानूनों में सुधार से अन्य समुदायों के इसी तरह के कानूनों में सुधार की राह प्रशस्त होगी।

अंबेडकर, जिन्होंने हिन्दू कोड बिल का मसविदा तैयार किया था, इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे कि हिन्दू पारिवारिक कानून, महिलाओं के साथ न्याय नहीं करते। हिन्दू कोड बिल, लैंगिक न्याय की अवधारणा पर आधारित था परंतु इस बिल को हिन्दू समुदाय के दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भी इस बिल का विरोध किया। बाद में, दकियानूसी और कट्टरपंथी तत्वों को संतुष्ट करने के लिए इस बिल के कई प्रावधानों में परिवर्तन किए गए। यह दिलचस्प है कि हिन्दू कोड बिल, सिक्खों, जैनियों और बौद्धों पर भी लागू होता है। हिन्दू कोड बिल में पारंपरिक प्रथाओं के लैंगिक पूर्वाग्रहों को दूर करने का प्रयास किया गया था। इसी सिलसिले में सरकार ने विशेष विवाह अधिनियम भी पारित किया, जो सभी धर्मों के लोगों पर लागू था परंतु इसका पालन करना आवश्यक नहीं था। किसी भी धर्म के व्यक्ति, विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह कर सकते थे।

समाज में सांप्रदायिक हिंसा और तनाव में बढ़ोत्तरी के साथ, मुस्लिम अल्पसंख्यक स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे। बहुसंख्यकवादी राजनीति की चुनौती का मुकाबला करने के लिए और अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ का बचाव करना शुरू कर दिया। आज मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की मांग मुख्यतः दो समूहों द्वारा की जा रही है। पहला है मुस्लिम महिलाओं का एक बड़ा वर्ग, जो ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’’ (बीएमएमए) के झंडे तले मुंहज़बानी तलाक की प्रथा का विरोध कर रहा है।  इस संगठन का कहना है कि मुंहज़बानी तलाक गैर-इस्लामिक है। इस्लाम के कई जानेमाने अध्येताओं की यह राय है कि इस प्रथा का कुरान में कहीं ज़िक्र नहीं है। मुस्लिम महिला संगठनों के साथ मिलकर ये अध्येता मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलवाने और उन्हें पुरूषों के समकक्ष अधिकार उपलब्ध करवाने के लिए अनवरत संघर्षरत हैं। मुस्लिम समुदाय पहले से ही वर्चस्ववादी सांप्रदायिक ताकतों के बढ़ते प्रभाव से स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है। जाहिर है कि मुस्लिम समुदाय के अंदर से पारिवारिक कानूनों में सुधार की जो मांग उठ रही है, उसका हमें समर्थन करना चाहिए।

एक दूसरा समूह, जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के संबंध में बहुत चिंता ज़ाहिर कर रहा है वह है संघ परिवार। यद्यपि संघ परिवार अत्यंत आक्रामक ढंग से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात कर रहा है तथापि वह यह भूल रहा है कि उसकी राजनीति के चलते ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा हो रही है। संघ परिवार ने हिन्दू कोड बिल का जी-जान से विरोध किया था। संघ परिवार, राम मंदिर और पवित्र गाय जैसे मुद्दे उठाता रहता है। सरसरी निगाह से देखने पर ऐसा लग सकता है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय के संबंध में संघ परिवार की चिंता जायज़ है। परंतु सच यह है कि संघ परिवार के असली इरादे संदेहास्पद हैं। वह हिन्दू पारिवारिक कानून में उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों में कमियों पर चुप रहता है। उदाहरणार्थ, हिन्दू महिलाओं को अपने माता-पिता की संपत्ति में उनके भाईयों के बराबर हक प्राप्त नहीं है। हिन्दू संयुक्त परिवार के नाम पर टैक्सों से बचने का प्रयास भी होता रहता है। यही कारण है कि अल्पसंख्यकों को सरकार के इस तरह के प्रयासों पर संदेह होता है। विधि आयोग द्वारा प्रसारित की गई प्रश्नावली भी एकतरफा है। एक ओर इस मुद्दे पर इतना शोर मचाया जा रहा है तो दूसरी ओर समान नागरिक संहिता का कोई मसविदा अब तक तैयार नहीं किया गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह का मसविदा इसलिए तैयार नहीं किया जा रहा है क्योंकि हिन्दुओं का एक बड़ा हिस्सा अपनी पारंपरिक प्रथाओं में बदलाव नहीं चाहता और वर्तमान में प्रचलित एकतरफा कानूनों से लाभ उठाते रहना चाहता है।

यह बहुत अजीब है कि समान नागरिक संहिता का कोई मसविदा तैयार न होने के बावजूद उसे लागू करने की मांग की जा रही है। भाजपा-आरएसएस के लिए, दरअसल यह एक ऐसा मुद्दा है जिसका इस्तेमाल समाज को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए जा सकता है। इन प्रयासों को विभिन्न धार्मिक समुदायों को किस रूप में देखना चाहिए? सबसे पहले यह ज़रूरी है कि विधि आयोग अपनी प्रश्नावली में इस तरह से संशोधन करे ताकि वह सभी समुदायों के प्रति निष्पक्ष बन सके। समान नागरिक संहिता तैयार करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सभी धर्मों के महिला संगठनों के साथ चर्चा की जानी आवश्यक है। क्या विभिन्न समुदाय ऐसे किसी मसविदे पर एक राय हो सकेंगे जो महिलाओं के साथ न्याय करता है?

इस तर्क में कोई दम नहीं है कि एक से पारिवारिक कानूनों से राष्ट्रीय एकता मज़बूत होती है। कई देशों में अलग-अलग धार्मिक समूहो के लिए अलग-अलग कानून प्रचलन में हैं और फिर भी उन देशों में एकता बनी हुई है। हमें यह समझना होगा कि आज ज़रूरत लैंगिक न्याय की है, एक-से कानूनों की नहीं। लैंगिक न्याय का यह अभियान नीचे से शुरू होना चाहिए और अल्पसंख्यकों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे स्वयं अपने कानूनों में सुधार की बात करें। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि मुंहज़बानी तलाक जैसी सड़ी-गली प्रथाएं जल्द ही इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दी जाएंगी। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

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